आदर के बदले ही मिलता है आदर

राम सिंह अपनी पढ़ाई पुरी करते ही बैंक में नौकरी लग था| कुछ ही दिनों में वो अपना तबदला करवाकर अपने जिला मुख्यालय स्थित ब्रांच में आ गया था| गांव में उसके पिता की बड़ी इज्जत थी| इसी वजह से उसे भी गांव व जिला मुख्यालय शहर में लोगों से बड़ी इज्जत मिली| गांव के लोग अपने घर की कोई जरुरी खरीददारी से पहले रामसिंह से सलाह करते थे और उसकी बतायी दूकान से ही खरीद करते थे जिससे शहर के दुकानदार रामसिंह की बड़ी इज्जत करते थे|

रामसिंह सप्ताहांत पर जब भी अपने गांव आता था उसके चारों और लोगों का मेला सा लगा रहता था, बूढ़े, जवान, बच्चे हर कोई रामसिंह के इंतजार में रहते थे| रामसिंह जिस घर में मिलने जाता उसके लिए चाय के कप के स्थान पर बड़ा सा दूध का गिलास आता था| गांव की कोई बरात हो तो उसमें भी रामसिंह की दुल्हे से भी ज्यादा आवभगत होती थी|
रामसिंह की पत्नी गांव की अन्य महिलाओं की अपेक्षा कुछ पढ़ी लिखी थी| शहर में भी रही थी इसलिए उसकी देवरानियां जेठानियाँ के साथ ही गांव की अन्य महिलाएं भी उसकी बड़ी इज्जत करती थी| इस तरह दोनों पति-पत्नी को गांव से अथाह प्यार व इज्जत मिलती थी|

कुछ वर्षों बाद गांव में होने वाले पंचायत चुनावों में गांव वालों को ग्राम पंचायत की सरपंच बनाने के लिए रामसिंह की पत्नी से बढ़िया कोई उम्मीदवार नहीं लगा यही नहीं उसकी जीत पक्की करने के लिए गांव वालों ने अपने पड़ौसी गांव वालों से भी बात कर ली| रामसिंह व उसकी पत्नी भी सरपंच बनना चाह ही रहे थे| आखिर एक दिन पंचायत के चुनाव हुए और रामसिंह की पत्नी संध्या चुनाव जीत ग्राम पंचायत की सरपंच बन गई| सरपंच बनने के बाद एक राष्ट्रीय पार्टी ने भी उसे एक पद दे दिया और आगामी विधानसभा व लोकसभा चुनावों में पार्टी प्रचार करने के लिए साधन भी उपलब्ध कराये| राष्ट्रीय पार्टी के नेताओं द्वारा अपने फायदे के लिए बार बार पूछने पर संध्या को लगा जैसे वह इस जिले की बहुत बड़ी महत्त्वपूर्ण राजनैतिक हस्ती बन चुकी है|

संध्या के सरपंच बनने के बाद रामसिंह का परिवार अब पुरुष प्रधान नहीं रहा अब वह स्त्री प्रधान परिवार बन चुका था| संध्या रामसिंह पर हावी हो चुकी थी, गांव में अपनी देवरानियों, जेठानियों को भी ऐसे समझने लगी जैसे वे उसकी नौकरानियां या दासियाँ हो| हर किसी की भी किसी भी समय बेइज्जती कर देना उसके व्यवहार में शामिल हो चुका था| अपने परिवार ही नहीं गांव के किसी भी बड़े बुजुर्ग की इज्जत करना अब सरपंच जी के लिए दुष्कर कार्य हो चुका था| संध्या ही क्यों रामसिंह भी अब अपने आपको गांव के किसी भी बड़े बुजुर्ग से बड़ा समझने लग गया था| दोनों की एक ही सोच हो गई थी कि जो वे कहे वही गांव वाले माने| और जो ना माने वही बेवकूफ और उनका दुश्मन|

आखिर पांच साल बाद फिर पंचायत चुनाव आये गए और इस बार गांव वालों के वोट देने से मना करने के बावजूद भी संध्या ने चुनाव लड़ा और जमानत भी नहीं बचा पाई| हाँ गांव के कुछ लोग उन्हें सरपंच का चुनाव लड़ने को जरुर उकसा रहे थे पर दोनों दम्पति उन उकसाने वालों की चाल नहीं समझ पाये, दरअसल उकसाने वालों की चाल थी कि इन्होंने अपने कार्यकाल में जो कुछ भ्रष्ट तरीके से कमाया उसे दुबारा चुनाव लड़ाकर खर्च करवा दिया जाय|वोट उकसाने वालों ने भी नहीं दिए| गांव में किसी सिरफिरे की अक्ल ठिकाने लगाने के लिए उसे उकसा कर व चढ़ा कर पंचायत चुनाव लड़ा उसमे मोटा खर्च करवा कर हरा देना गांव वालों का एक तगड़ा और पसंदीदा हथकंडा है|हालाँकि अक्सर शहरी लोग गांव वालों को राजनैतिक तौर पर अनाड़ी समझते पर मेरा अनुभव कहता है कि राजनैतिक समझ के मामले में शहरी पढ़े लिखे लोग गांव के पढ़े लिखे के आगे तो दूर अनपढ़ लोगों के आगे भी कहीं नहीं ठहरते |

दोनों को गांव वालों ने जो इज्जत दी उसे वे पचा नहीं पाये| जिस रामसिंह के गांव में सप्ताहांत पर आने का गांव के सभी वर्ग के लोगों को इंतजार रहता था आज वही लोग रामसिंह जब गांव के रास्ते से निकल रहा होता है तो उसकी और नजर उठाकर भी नहीं देखते| शहर के जो बड़े बड़े प्रतिष्ठित लोग उसकी हर बात मानते थे वे उसकी एक बार उसके अपने ही बड़े भाई के साथ विवाद का हल करने बैठी पंचायत में बड़े भाई के साथ किये दुर्व्यवहार से आहत होकर किनारा कर चुके है|
एक समय था जब गांव से गई हर बारात में दुल्हे से ज्यादा रामसिंह की पूछ होती थी अब उसी रामसिंह को आधे से ज्यादा गांव वाले बारात में लेकर ही नहीं जाते और यदि वह किसी बारात में शामिल होने में सफल भी हो जाता है तो बारात में उसे पूछने वाला कोई नहीं होता| अकेला ही किसी कोने में बैठा टुकर टुकर देखता रहता है| संध्या भी जब भी गांव के किसी शादी समारोह में आती है उससे बात करने वाली बहुत कम महिलाएं होती है जो होती है उन्हें संध्या से कोई मतलब होता है|

अपने गलत व्यवहार व घमण्ड के चलते एक ऐसे दम्पति ने अपनी वह इज्जत गंवा दी जो उन्हें गांव वासियों से मिलती थी|

जब तक हम दूसरों को इज्जत देते रहेंगे तब तक दूसरों से भी इज्जत व आदर पाते रहेंगे| जब हम किसी का आदर नहीं कर सकते तो हमें भी किसी से आदर मिलने की उम्मीद नहीं रखनी चाहिए|

नोट :- यह लेख एक सच्ची कहानी पर आधारित है सिर्फ पात्रों के नाम बदले गये है|

8 Responses to "आदर के बदले ही मिलता है आदर"

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