आंनदपाल प्रकरण : आन्दोलनकारियों पर दर्ज मुकदमें वापस लेने के पीछे ये राजनीति तो नहीं

आंनदपाल प्रकरण : आन्दोलनकारियों पर दर्ज मुकदमें वापस लेने के पीछे ये राजनीति तो नहीं

कल राजपूत समाज के एक शिष्टमंडल से मुलाकात के बाद नागौर जिले के सांवराद में आंनदपाल एनकाउंटर के बाद हुए आंदोलन में दर्ज सभी मुकदमों को सरकार ने वापस लेने का अतिमहत्वपूर्ण फैसला लिया है। शिष्टमंडल से मुलाक़ात के तुरंत बाद मुख्यमंत्री ने संबंधित मंत्रालय व DGP से सवांद कर ग्रह सचिव व ADG क्राइम को उसी समय सभी मुकदमों को तत्काल वापस लेने के आदेश के साथ प्रकिया को समयबद्ध कर निश्चित समय में पूरी करने के निर्देश भी दिए। आपको बता दें इससे पहले राजपूत समाज के नेताओं के साथ समझौता होने के बावजूद सरकार ने ये मामले वापस नहीं लिए और इन्हें सीबीआई जाँच में शामिल कर एक तरह राजपूत समाज के नेताओं के हाथों पैन्डोरा बॉक्स पकड़ा दिया था|

लेकिन चुनावों से पूर्व अचानक एक शिष्टमंडल के मिलते ही मुख्यमंत्री ने तुरंत संज्ञान लेते हुए मुकदमें वापस लेने का आदेश दे दिया| दरअसल ये सारी कवायद राजपूत समाज में भाजपा से बढती नाराजगी को दूर करने के लिए की गई प्रतीत होती है| सबसे दिलचस्प बात यह है कि सरकार ने आन्दोलन करने वाली संघर्ष समिति जिससे पहले समझौता किया था, को याद भी नहीं किया और भाजपा से जुड़े कुछ छुटभयै नेताओं के शिष्टमंडल से मिलते ही तुरंत बात मान ली गई| इससे ऐसा प्रतीत होता है कि राजपूत समाज को राजी करने के लिए ये सब प्रयोजित था|

ज्ञात ही कल के शिष्टमण्डल में कुछ ऐसे युवा भाजपा नेता भी थे जो आनंदपाल आन्दोलन के खिलाफ थे, लेकिन कल अचानक उनके मन में उक्त आन्दोलनकारियों के प्रति हमदर्दी उमड़ पड़ी और उन्होंने मुख्यमंत्री से मिलकर उनके मुकदमें वापस करवा दिए| कल हुए फैसले की खबर के बाद सोशियल मीडिया में उक्त शिष्टमंडल पर राजपूत युवाओं द्वारा फब्तियां कसने के साथ इनके विरोध का सिलसिला शुरू हो गया| जय राजपुताना संघ के संस्थापक भंवरसिंह रेटा ने शिष्टमंडल में शामिल नेताओं को दल्लेसिंह की उपमा देते हुए समाज को ऐसे लोगों से सावधान रहने का आव्हान किया है| रेटा ने फेसबुक पर लिखा है कि “जैसे जैसे चुनाव नजदीक आ रहे है, ऐसे कई दल्लेसिंह जोंक बन कर समाज का खून चूसने आएंगे।अत: इनकी शिनाख्त करना आवश्यक है|”

समाज के कई बुद्धिजीवी आन्दोलन करने वाली संघर्ष समिति को किनारे कर अपने ही समर्थित लोगों का प्रायोजित शिष्टमंडल बुलाकर तुरंत उसकी बात मान लेना, मुख्यमंत्री द्वारा राजपूत समाज में फूट डालने की कोशिश के रूप में देख रहे हैं| आपको बता दें जब जब राजपूत समाज ने एक होने की कोशिश की है भाजपा से जुड़े कुछ नेताओं ने अड़ंगा लगाया है, चाहे अमरूदों को बाग़ हो या फिर फरवरी में दिल्ली में हुई क्षत्रिय संसद|

जो भी हो ज्ञान दर्पण परिवार आन्दोलनकारियों पर दर्ज मुकदमें वापस लेने का स्वागत करता है|

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