अंग्रेज संधि से क्रुद्ध इस वीर ने कप्तान लुडलो पर तलवार से किया था वार

उस दिन जोधपुर का मेहरानगढ़ किला खाली करके अंग्रेजों को सुपुर्द करने का कार्य चल रहा था। किले के बाहर कर्नल सदरलैण्ड और कप्तान लुडलो अपने पांच-सात सौ सैनिकों के साथ किले पर अधिकार के लिए किला खाली होने का इंतजार कर रहे थ। किले के किलेदार रायपुर ठिकाने के ठाकुर माधोसिंह किला खाली करने के पक्ष में नहीं थे। उन्होंने महाराजा मानसिंह की किले में उपस्थिति के बिना किला खाली करने से साफ इंकार कर दिया। आखिर स्वतंत्र रहने की चाहत रखने वाले किलेदार को महाराजा मानसिंह ने किले में आकर समझाया तब जाकर किलेदार किला खाली करने को सहमत हुये।

महाराजा ने स्वयं साथ जाकर अंग्रेजों के आदमियों को जगज जगह नियुक्त करने के साथ उनका अपने आदमियों से परिचय कराया। इस तरह मेहरानगढ़ किला खाली कर दिया गया। राजा व रानियाँ भी किले से बाहर रहने को चले गये। किला खाली होने की सूचना पाकर कर्नल सदरलैण्ड और कप्तान लुडलो अपने सैनिकों के साथ किले के भीतर गए। कर्नल सदरलैण्ड महाराजा के साथ वापस आ गया और कप्तान लुडलो अपने 300 सैनिकों के साथ किले की व्यवस्था व प्रबन्ध हेतु किले में रहा। इस तरह जोधपुर के मेहरानगढ़ किले पर जिसकी स्वतंत्रता लिए रणबंका राठौड़ों ने वर्षों अपने प्राणों का वर्षों तक बलिदान दिया, अंग्रेजों के अधीन हो गया।


लेकिन स्वतंत्रता प्रेमी लोगों को यह सब रास नहीं आया, कवियों ने अपनी रचनाओं में इस घटना पर व्यंग्यपूर्ण अभिव्यक्तियाँ की। एक कवि ने इस पर प्रतिक्रिया स्वरूप कहा-

राण्या तळहट्या उतरै, राजा भुगतै रेस।
गढ़ ऊपर गौरां फिरै, सुरग गया सगतेस।।

इस दोहे का असर अन्य किसी पर हुआ हो या नहीं, परन्तु वहां उपस्थित स्वतंत्रता प्रिय करमसोत राठौड़ सरदार भोमजी पर अवश्य हुआ और उसकी प्रतिक्रिया जुबान से ना होकर तलवार के वार से अभिव्यक्त हुई। भोमसिंह ने सुरक्षा कर्मियों से घिरे पॉलिटिकल एजेन्ट मिस्टर लुडलो पर एकाएक तलवार से वार कर अपने राजपूती शौर्य और स्वतंत्रता प्रेम को प्रदर्शित किया। सुरक्षाकर्मियों के बीच में आने के कारण मिस्टर लुडलो मामूली चोट से घायल ही हुआ, पर लुडलो के सुरक्षा कर्मियों से मुठभेड़ में भोमसिंह घायल हो गया और वह चार-पांच दिन बाद वीरगति को प्राप्त हुआ। इस घटना पर महाराजा द्वारा खेद प्रकट करने पर मामला वहीं शांत हो गया। जोधपुर के स्वतंत्रता प्रिय महाराजा मानसिंह को अपने राज्य की आंतरिक परिस्थियों, उनके खिलाफ अनवरत चले षड्यंत्र, सामंत-सरदारों का पूर्ण सहयोग नहीं मिलने पाने के कारण विवश होकर वि.सं. 1860, पौष शुक्ल 9 को अंग्रेजों के साथ संधि करनी पड़ी। किन्तु शर्तों के उटपटांग होने के कारण महाराजा मानसिंह ने उस पर अपने हस्ताक्षर नहीं किये। वि.सं. 1874 पौष कृष्णा 30 को छत्रसिंह के राज्यकाल के समय पुनः अंग्रेजों के साथ संधि हुई। महाराजा मानसिंह इस संधि से संतुष्ट नहीं थे। वि. सं. 1875 में अंग्रेजों से एक और संधि हुई, किन्तु महाराजा मानसिंह ने कभी अंग्रेजों को कर नहीं चुकाया और आंतरिक शासन में अंग्रेजों के दखल को लेकर उनके हमेशा मतभेद रहे।

महाराजा को बेशक अपनी विवशता के चलते अंग्रेजों से संधि करनी पड़ी, पर भोमसिंह द्वारा अंग्रेज अधिकारी पर हमला करने, ठाकुर माधोसिंह द्वारा किला खाली करने से इन्कार करना साफ जाहिर करता है कि आम राजपूत अंग्रेजों की चाल को समझता था और उसे अंग्रेजों की गुलामी पसंद नहीं थी। इससे पूर्व भी साथीणा के भाटी सरदार शक्तिदान ने अंग्रेज सत्ता के खिलाफ अपनी अभिव्यक्ति व्यक्त की थी, पर उनका अजमेर में निधन के होने के बाद यह मुहीम आगे नहीं बढ़ी।

सन्दर्भ: इस घटना का जिक्र पंडित विश्वेश्वर नाथ रेऊ ने अपनी पुस्तक ‘मारवाड़ के इतिहास’ व ‘करमसोत राठौड़ों का पूर्वज और वंशज’ पुस्तक में सवाईसिंह व छाजूसिंह बड़नगर ने किया है।

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About Ratan singh shekhawat

Ratan Singh Shekhawat, Bhagatpura, Rajasthan.
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