अनोखे स्वतंत्र्य सेनानी बलजी- भूरजी शेखावत

अंग्रेजों और उनसे संरक्षित राज्यों के राज्याधिकारों एवं उनका अनुसरण करने वाले गुलाम मनोवृति के बुद्धिजीवियों ने बलजी-भूरजी को डाकुओं की संज्ञा दी है जैसा जैसा कि पहले डूंगजी-जवाहरजी जैसे राष्ट्रीय वीरों के लिये किया जा चुका है किन्तु बलजी और भूरजी के चरित्र का यदि सही और निष्पक्ष रूप से अंकन किया जावे तो उनके अन्दर छिपी अंग्रेज विरोधी भावना और अपने दादा डूंगजी की अंग्रेज विरोधी परम्परा को जीवित रखने की महती इच्छा का ही आभास मिलेगा।

सीकर के रावराजा माधवसिंहजी के जमाने में जबकि अंग्रेजी शासन के विरुद्ध भारतीय जन मानस में विद्रोह की आग भड़क रही थी, बलजी और भूरजी नामक उन दो शेखावत वीरों का उदय हुआ, जिन्होनें बारोठिया बनकर यानी विद्रोही होकर अंग्रेज शासित इलाकों में डाके डालने की धूम मचा दी और जोधपुर राज्य के गाँवों का उन्होंने इस कारण बिगाड़ किया कि उनके दादा डूंगजी को पकड़कर आजन्म कैद रखा था जिसके प्रतिशोध की आग उन वीरों के हृदयों में सदा जलती रहती थी।

शेखावाटी क्षेत्र के सीकर जिले के पाटोदा ग्राम में बलजी भूरजी का जन्म हुआ। वे दोनों नसीराबाद की छावनी लूटने वाले प्रसिद्ध वीर डूंगजी की वंश परम्परा में थे। शेखावतों की रावजीका शाखा में उत्पन्न सीकर के इतिहास प्रसिद्ध राव शिवसिंह से उनकी वंश परम्परा चलती है। उनके दादा परदादाओं ने सच्चे शूरवीर क्षत्रियों की भांति युद्ध क्षेत्रों में ही अपने प्राणों को होमा था। वीरों की उसी अविछिन्न श्रृंखला में जन्मे बलजी और भूरजी भाई थे। भूरजी अति साहसी और तेज मिजाज व्यक्ति थे। बलजी धीर गम्भीर पुरूष थे। वे भूरजी को कहीं भी जल्दबाजी में अनुचित कार्य नहीं करने देते थे।

बागी बनकर देश में लूटमार करते रहने के बावजूद भी बलजी और भूरजी का चरित्र उद्दात और महान था। वे निर्बलों, गरीबों एवम् दीन दुखियों के रक्षक एवम् पालक के रूप में जाने जाते थे। अनेक अनाथ और गरीब ब्राह्मण एवम् षट वर्ण की कन्याओं के विवाह उन्होनें अपने पास से द्रव्य देकर करवाये। अनेक अबलाओं के जिनके मातृ पक्ष में कोई पुरूष सदस्य नहीं बचा था, मायरा (भात) लेकर धर्म भाई बनने का पुण्य लाभ कमाया। कमजोरों की रक्षा करते हुये उन्होंने अनेक बार सबल आतताइयों और दुराचारियों को दण्ड दिया| गरीबों को उन्होंने कभी नहीं सताया। अंग्रेज शासित प्रदेश में उनके नाम का आतंक छाया हुआ था। आगरा, पटियाला तथा मालवा तक वे धावा मारते थे। किन्तु आम जनता की सहानुभूति और प्रेम सदैव उनके साथ था। अपने विद्रोही जीवन में एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमते हुये वे देश के इन्हीं सीधे सादे सहृदय लोगों के यहाँ विश्राम लेते थे। उनके घर की जौ-जुवार की रोटियाँ खाकर प्रसन्न होते और समय-समय पर उन्हें आर्थिक मदद देते थे। उनकी जवानी का सारा समय इसी प्रकार बीता। उनको जिन्दा पकड़ने के अनेक प्रयत्न हुये, किन्तु उन शेरों को पिंजरे में जीवित आबद्ध नहीं किया जा सका।

अन्त में राजपूताना के पालिटिकल एजेन्ट के परामर्श और जयपुर राज्य की सहमति से जोधपुर के रिसाले और सुतर सवार (ऊंट रिसाला के सवार) पुलिस फोर्स के जवानों ने जिनका नेतृत्व जोधपुर के ख्याति प्राप्त डी.आई.जी. बख्तावरसिंह कर रहें थे, बलजी भूरजी का पीछा किया| मारवाड़ में बख्तावरसिंह के नाम से हिरण खोड़े होते थे। वास्तव में बड़ा साहसी और दबंग लौह पुरूष था बख्तावरसिंह। तीन सौ सशस्त्र ऊंट सवारों और जवानों के साथ बख्तावरसिंह ने कालूखाँ नामक क्यामखानी की मुखबरी के आधार पर योद्धाओं के क्षेत्र शेखावाटी में प्रवेश किया। उस समय बलजी भूरजी के पास गणेश दरोगा के सिवाय और कोई साथी या सहायक नहीं था। बलजी उस समय ज्वर से पीड़ित थे। उस रात्रि में खबर दी कि कील कांटे से लैस जवानों के साथ बख्तावरसिंह समीप ही आ पहुंचे हैं। आपस में परामर्श हुआ और ज्वर पीड़ित बलजी भूरजी ने वहां से निकल जाने की सलाह दी और स्वयं ने वहीं डट कर पीछा करने वालों से लड़ने की इच्छा व्यक्त की। बलजी माने नहीं। उन्होंने कहा- मैं बुद्ढा हो चुका हूं और बीमार हूं न जाने कब मृत्यु दबोच ले। इससे अच्छा सुअवसर मुझे फिर कब मिलेगा कि मैं लड़कर मारा जाऊं। गणेश को भी वहाँ से चले जाने के लिये काफी कहा गया किन्तु वीर ने उन्हें छोड़कर चले जाने में अपनी मरदानगी का अपमान समझा और वह भी उनके साथ ही मरने मारने पर उद्यत हो गया। मरने मारने के लिये दृढ़ संकल्प वीरों के सामने एक धर्म संकट और था। जिस स्थान पर वे ठहरे हुये थे- वह चारणों की भूमि थी। अपने पूर्वजों द्वारा चारणों को दान में दी गई भूमि को वे उदकी हुई, त्यागी हुई भूमि मानते थे। उस भूमि पर लड़कर प्राण त्यागना उनकी समझ में श्रेयस्कर नहीं था। अतः उन्होंने उसी समय उस स्थान को छोड़ दिया और कुछ आगे बढ़कर बैरास नामक गाँव की रोई में मोरचे जमाये।

शेखावतों के एक भूतपूर्व ठिकाने महणसर से कुछ ही दूरी पर बैरास गाँव है। बालू के टीबों से ढ़के उस रेगिस्तान में खेजड़े के वृक्ष और फोग के पौधों के सिवाय सुरक्षार्थ ओट लेने के लिये कोई साधन नहीं था। ऊंटों को टीबों के ढाल में बैठाकर उन तीनों ने थोड़े-थोड़े फासले पर फोगों के पौधों की आड़ लेकर अपने मोरचे जमाये। ठाकुर बख्तावरसिंह भी अपने जासूसों द्वारा उन बारोठियों की गतिविधि की पल पल की खबर ले रहा था| उनके बैरास गाँव के जंगल में जाते ही वह भी आगे बढ़ा और उस स्थान को तीन तरफ से घेर लिया। अब वे सूर्योदय की प्रतिक्षा करने लगे।

कार्तिक का महिना था। काफी अच्छी ठंड पड़ रही थी। सूर्योदय से घण्टे भर पूर्व ही महणसर और बैरास के निवासियों की नींद धमाकों की आवाजें सुनकर अचानक टूटी और उन्हें ऐसा मालूम हुआ कि पास ही कहीं बन्दूकों से गोलियों का जमकर आदान-प्रदान हो रहा है। लगभग एक घण्टे से भी अधिक गोलियाँ चली। बैरास गाँव के उस खेत में कारतूसों के खाली खोके ही खोके नजर आ रहे थे| नामी बारोठियों से मुकाबला था। तीन वीर तीन सौ सैनिकों से जूझ रहे थे। एक गीत में उनका वर्णन इस प्रकार आया है-

गीत
पण कर धरम राखण छतरी पण, सूरा पण राख्यो संसार |
कर बांध्यों कीरत-हर कांकण, ध्रम रजपूती मोड़ सधार।।१।।
जाजुल जान बणी जोधारां, अस्त्र-शस्त्र भरिया आपांण |
मारूधर मेवाड़ मालवी, दलमलता फिरिया दईवाण ।।२।।
भूर बलेस गणेश दरोगो, नीडर हुवा आता दल नाल ।
औतो तीन तीनसै बारू, खेत-बैरास बग्यो रिण खाल ।।३।।
सात धड़ी सिर बिन जुध सझियो, सत्रुवां घर मचियो घण सोक |
जैसराज सुतन जोधा नै, लेगी वर अफछर सुरलोक ।।४।।

अकेले उन तीन शूरमाओं ने कील कांटे से लैस तीन सौ जवानों का डटकर मुकाबला किया और बैरास के उस खेत को रणखेत में परिणित कर दिखाया। सरकारी रिपोर्ट चाहे प्रकाशित न हुई हो, किन्तु प्रत्यक्षदर्शियों का अनुमान था कि जोधपुर पुलिस फोर्स के अनेक ऊंट और जवान मारे गये और अनेकों घायल हुये|

इस घमासान में सबसे पहले बलजी की गर्दन पर गोली लगी और वे वीर मृत्यु को प्राप्त हुये। फायरिंग करते करते गणेश के पास से प्राय: सभी कारतूस समाप्त हो चुके थे। उसने बलजी को लुढ़कते देखकर उनके पास की बन्दूक और कारतूसों का थैला लेने को उनकी लाश के पास जाने का प्रयास किया और उसी साहसिक प्रयास में वह वीर शत्रुओं की गोली खाकर शहीद हुआ। किन्तु अनोखे और अद्वितीय वीर भूरजी की तो बात ही निराली थी। वह अकेला वीर अपनी बन्दूक के लगातार फायरों से घेरे वालों को चैन नहीं लेने दे रहा था। उस शूरमां पर तीन दिशाओं से गोलियों की बोछार हो रही थी और वह अकेला उनका जबाब उसी त्वरा और गति से दे रहा था| उनका शरीर गोलियों की बोछार से छलनी हो गया| खून से सारे वस्त्र लथ पथ हो गये। किन्तु मूंछे तनी हुई भौंहों से अड़ी हुई थी। मजबूत हाथों से पकड़ी बन्दूक वैसे ही हाथों में जमी हुई थी। खाली कारतूसों के खोखे आस-पास बिखरे हुये थे। वीर मुद्रा में सजा बैठा वह वीर मृत्यु को प्राप्त होकर भी उसी प्रकार दीख रहा था मानो जिन्दा हो। कहा नहीं जा सकता के कब और कौनसी गोली से उनका प्राणान्त हुआ ? किन्तु घेरा डालने वालों को विश्वास ही नहीं हुआ कि भूरजी मारे गये। मरूभूमि के सुन्दर पौधे फोग की ओट में वीरासन से बैठा वह वीर उन्हें जीवित ही नजर आ रहा था। इसी कारण उनकी मृत्यु के पश्चात् भी उन लोगों ने फायरिंग जारी रखा। ठाकुर बख्तावरसिंह को जब विश्वास हो गया कि मुक्त मुद्रा में सजा बैठा वीर मृत है, जीवित नहीं तब वह उस स्थान पर गया और मृत वीर के सामने नतमस्तक होकर उसे वीरोचित सम्मान दिया। सरकार ने उन वीरों की तस्वीरें उतार कर इंग्लैण्ड भेजी।

शेखावाटी में बलजी भूरजी सम्बन्धी अनेक रचनायें लोगों की जबान पर है।

कड़ब साणकी कड़बी कोनी, भला पछाड़या मल्ला नै।
पाकरण्यों परमातां बोल्यो, रंग है भूरा बल्लानै।
भर लोरी मुड़दां की भेजी, जोधाणां का जिल्ला नै।
राठोड़ा की घणों रूआंणी, रंग है भूरा बल्ला नै।

लेखक ठा. सुरजनसिंह झाझड़


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Ratan Singh Shekhawat, Bhagatpura, Rajasthan.
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