Apr 25, 2011

केसे कह दू




तुम आती हो जाती हो ,

तुम आती हो जाती हो

दिन हो या रात बस

हर पल चलती रहती हो

थक जाती होगी ना ?

आस मे रहती हो की

शायद मै
कभी कह दू

तुम्हे
की तुम आराम क्यों नहीं कर लेती

मै इतना भी नादाँ नहीं की तुम्हे ये कह दू

हा कह लो मुझे स्वार्थी ,

नहीं कहूँगा तुम्हे रुकने को

तब तक
जब तक

मेरी हर ख्वाहिश पूरी ना हो जाती है

अब तुम ही कहो केसे कह दू मै तुम्हे

रुकने को

केसे कह दू की तुम थम जावो



आखिर सांसे हो तुम मेरी

11 comments:

  1. कैसे कोई भी कह दे....


    बेहतरीन.

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  2. हमेशा की तरह वाह - वाह कहना ही पड़ रहा है आप गायब हो जाती हैं मुझे इस बात की नाराजगी है .

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  3. काफी दिनों बाद आपकी ये पोस्ट दिखाई दी है | सुन्दर और सच्ची बात कही है |

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  4. बढ़िया रचना | लिखने में नियमितता बनाएं रखें |

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  5. बहुत सुंदर रचना, धन्यवाद

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  6. बहुत सुंदर रचना है|

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  7. बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति।

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