Dec 17, 2010

उजळी और जेठवै की प्रेम कहानी और उजळी द्वारा बनाये विरह के दोहे-3

उजळी द्वारा अपने प्रेमी जेठवा के विरह में लिखे दोहे -

जळ पीधो जाडेह, पाबसर रै पावटे |
नैनकिये नाडेह, जीव न धापै जेठवा ||


मानसरोवर के कगारों पर रहकर निर्मल जल पिया था तो हे जेठवा अब छोटे छोटे जलाशयों के जल से तृप्ति नहीं होती |

उपर्युक्त दोहे का समानार्थी यह भी है | "पीधो" में बीते हुए सुखों की एक छाया है और "न धापै" में वर्तमान की करुणा उत्पादक अवस्था का चित्रण है | एक दोहे में भूतकाल की रंगरेलियां एवं वर्तमान की चीत्कारों का कैसा अपूर्व मिश्रण है ?

ईण्डा अनल तणाह, वन मालै मूकी गयो |
उर अर पांख विनाह, पाकै किण विध जेठवा ||

पक्षी अपने अंडे वन के किसी घोसले में छोड़कर चला गया है | ह्रदय और आँखों की गर्मी बिना वे अंडे किस प्रकार पाक सकते है ?

जेठवा प्रेम का अंकुर बोकर चला गया, वे अंकुर वांछित खाद्य व पानी बिना किस प्रकार फूल सकते है ? 'वन मालै मूकी गयो' में छिपी तड़फ पाठकों के हृदय को बेध डालती है |

जंजर जड़िया जाय, आधे जाये उर महें |
कूंची कौण कराँह, जड़िया जाते जेठवै ||

हृदय के अन्दर आगे जाकर जो जंजीरे कास दी गई है उनके जेठवा जाते समय ताले भी लगा गया अत: और किससे चाबी ला सकती हूँ ?

यह है उजळी के हृदय का हृदयविदारक हाहाकार ! सहृदय पाठक इसे पढ़कर उजळी के हृदय की थाह पा सकते है और साथ ही यह भी ज्ञात कर सकते है कि राजस्थानी लोक साहित्य भी कितना संपन्न है | संसार के श्रेष्ठ साहित्यों में ही एसा वर्णन प्राप्त हो सकता है अन्य जगह नहीं |

ताला सजड़ जड़ेह, कूंची ले कीनै गयो |
खुलसी तो आयेह (कै) जड़िया रहसी जेठवा ||

मजबूत ताले जड़कर उसकी चाबी लेकर तू कहाँ गया ? हे जेठवा ! यह ताले यदि खुलेंगे तो तेरे आने पर ही, नहीं तो यों ही बंद रहेंगे |

'कीनै गयो' में भावुक राजस्थानी हृदय की कितनी जिज्ञासापूर्ण तड़फ है | जानते हुए भी पूछ उठती है 'किधर गया' | 'कै जड़िया रहसी जेठवा' में दुखी हृदय का कितना दयनीय निश्चय है |

आवै और अनेक, जाँ पर मन जावै नहीं |
दीसै तों बिन जागां सूनी जेठवा ||

अन्य कई आते है लेकिन उन पर मन नहीं जाता | हे जेठवा ! तुझे न देखकर तेरी जगह शून्य लगती है |

राजस्थानी में एक कहावत है ' भाई री भीड़ भुआ सूं नी भागै" अर्थात भाई की कमी भुआ (फूफी) से पूरी नहीं होती | यही हल है जेठवे के चले जाने पर उजळी का | यों तो संसार में आवागमन का तंत्र बना रहेगा लेकिन उससे क्या ? जेठवे के सहृदय उजळी को कोई नहीं मिल सकेगा | प्रिय वास्तु बीते हुए क्षण की भांति जब हाथ से निकल जाती है तो पुनः प्राप्त नहीं होती | उजळी का हृदय भी कह उठता है - "दीसै तों बिन जागां सूनी जेठवा" | हृदय की शुन्यता का इस सोरठे में कितना यथार्थ शाब्दिक प्रतिबिम्ब प्रकट किया गया है |

समाप्त

5 comments:


  1. सुन्दर दोहे हैं विरह के
    आभार

    एंजिल से मुलाकात

    ReplyDelete
  2. प्रेम की महिमा अपरम्पार

    ReplyDelete
  3. यदि आप अच्छे चिट्ठों की नवीनतम प्रविष्टियों की सूचना पाना चाहते हैं तो हिंदीब्लॉगजगत पर क्लिक करें. वहां हिंदी के लगभग 200 अच्छे ब्लौग देखने को मिलेंगे. यह अपनी तरह का एकमात्र ऐग्रीगेटर है.

    आपका अच्छा ब्लौग भी वहां शामिल है.

    ReplyDelete
  4. विरह की गहराई का प्रतिबिम्ब हैं ये दोहे।

    ReplyDelete
  5. विरह की वेदना का सजीव चित्रण किया गया है | राजस्थानी भाषा में इस प्रकार के लेख किताबो से निकल कर नेट की दुनिया में आपके ब्लॉग के माध्यम से आ रहे है जिसके लिए आभार |

    ReplyDelete

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...

Share

Twitter Delicious Facebook Digg Stumbleupon Favorites More