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Mar 6, 2010

उत्तर भड़ किंवाड़ - 2

भाग एक का शेष ...........
" नहीं बेटा ! तुम्हारे पिता ने तो मेरी माता को वचन दिया था परन्तु इस धरती से तुम्हारा जन्म हुआ है और तुम्हारा जन्म ही उसकी आन रखने का वचन है | इस नीलाकाश के नीचे तुम बड़े हुए हो और तुम्हारा बड़ा होना ही इस गगन से स्वतंत्र्य और स्वच्छ वायु बहाने का वचन है | तुमने इस सिंहासन पर बैठकर राज्य सुख और वैभव का भोग भोग है और यह सिंहासन ही इस देश की आजादी का , इस देश की शान का , इस देश की स्त्रियों के सुहाग ,सम्मान और सतीत्व की सुरक्षा का जीता जागता जवलंत वचन है | क्या तुम ........................|
' क्षम करो माँ ! मैं शर्मिंदा हूँ | शत्रु समीप है | तूफानों से अड़ने के लिए मुझे स्वस्थ रहने दो | मैं भोला हूँ - भूल गया पर इस जिन्दगी को विधाता की भूल नहीं बनाना चाहता |'
झन न न न !
रावल भोजदेव ने घंटा बजाकर अपने चाचा जैसल को बुलाया |
' चाचा जी ! समय कम है | रणक्षेत्र के लुए में जिन्दगी और वर्चस्व की बाजी लगानी पड़ेगी | आप बादशाह से मिल जाईये और मैं आक्रमण करता हूँ | कमजोर शत्रु पर अवसर पाकर आघात कर , हो सके तो लुद्रवा का पाट छीन लें अन्यथा बादशाह से मेरा तो बैर ले ही लेंगे |
जैसल ने इंकार किया , युक्तियाँ भी दी , किन्तु भतीजे की युक्ति , साहस और प्रत्युत्पन्न मति के सामने हथियार डाल दिए | इधर जैसल ने बादशाह को भोजदेव के आक्रमण का भेद दिया और उधर कुछ ही दुरी पर लुद्रवे का नक्कारा सुनाई दिया |

मुसलमानों ने देखा १५ वर्ष का का एक छोटा सा बालक बरसात की घटा की तरह चारों और छा गया है | मदमत्त और उन्मुक्त -सा होकर वह तलवार चला रहा था और उसके आगे नर मुंड दौड़ रहे थे | सोई हुई धरती जाग उठी , काक नदी की सुखी हुई धारा सजल हो गई , गम सुम खड़े दुर्ग ने आँखे फाड़ फाड़ कर देखा - उमड़ता हुआ साकार यौवन अधखिले हुए अरमानों को मसलता हुआ जा रहा है | देवराज और विजयराज की आत्माओं ने अंगडाई लेकर उठते हुए देखा - इतिहास की धरती पर मिटते हुए उनके चरण चिन्ह एक बार फिर उभर आए है और उनके मुंह से बरबस निकल पड़ा - वाह रे भोज , वाह !
दो दिन घडी चढ़ते चढ़ते बादशाह की पन्द्रह हजार फ़ौज में त्राहि त्राहि मच गई | उस त्राहि त्राहि के बीच रणक्षेत्र में भोजदेव का बिना सिर का शरीर लड़ते लड़ते थक कर सो गया - देश का एक कर्तव्य निष्ठ सतर्क प्रहरी सदा के लिए सो गया | भोजदेव सो गया , उसकी उठती हुई जवानी के उमड़ते हुए अरमान सो गए , उसकी वह शानदार जिन्दगी सो गई किन्तु आन नहीं सोई | वह अब भी जाग रही है |
जैसल ने भी कर्तव्य की शेष कृति को पूरा किया | बादशाह को धोखा हुआ | उसने दुतरफी और करारी मात खाई | आबू लुटने के उसके अरमान धूल धूसरित हो गए | सजधज कर दुबारा तैयारी के साथ आकर जैसल से बदला लेने के लिए वह अपने देश लौट पड़ा और जैसल ने भी उसके स्वागत के लिए एक नए और सुद्रढ़ दुर्ग को खड़ा कर दिया जिसका नाम दिया - जैसलमेर ! इस दुर्ग को याद है कि इस पर और कई लोग चढ़कर आये है पर वह कभी लौटकर नहीं आया जिसे जैसल और भोजदेव ने हराया | आज भी यह दुर्ग खड़ा हुआ मन ही मन " उत्तर भड़ किंवाड़ भाटी " के मन्त्र का जाप कर रहा है |
आज भी यह इस बात का साक्षी है कि जिन्हें आज देशद्रोही कहा जाता है , वे ही इस देश के कभी एक मात्र रक्षक थे | जिनसे आज बिना रक्त की एक बूंद बहाए ही राज्य , जागीर , भूमि और सर्वस्व छीन लिया गया है , एक मात्र वे ही उनकी रक्षा के लिए खून ही नहीं , सर्वस्व तक को बहा देने वाले थे | जिन्हें आज शोषक , सामंत या सांपों की औलाद कहा जाता है वही एक दिन जगत के पोषक, सेवक और रक्षक थे | जिन्हें आज अध्यापकों से बढ़कर नौकरी नहीं मिलती , जिनके पास सिर छिपाने के लिए अपनी कहलाने वाली दो बीघा जमीन नसीब नहीं होती , जिनके भाग्य आज राजनीतिज्ञों की चापलूसी पर आधारित होकर कभी इधर और कभी उधर डोला करते है , वे एक दिन न केवल अपने भाग्य के स्वयं विधाता ही थे बल्कि इस देश के भी वही भाग्य विधाता थे | जिन्हें आज बेईमान , ठग और जालिम कहा जाता है वे भी एक दिन इंसान कहलाते थे | इस भूमि के स्वामित्व के लिए आज जिनके हृदय में अनुराग के समस्त स्रोत क्षुब्ध हो गए है वही एक दिन इस भूमि के लिए क्या नहीं करते थे |
लुद्रवे का दुर्ग मिट गया है जैसलमेर का दुर्ग जीर्ण हो गया है , यह धरती भी जीर्ण हो जाएगी पर वे कहानियां कभी जीर्ण नहीं होगी जिन्हें बनाने के लिए कौम के कुशल कारीगरों ने अपने खून का गारा बनाकर लीपा है और वे कहानियां अब भी मुझे व्यंग्य करती हुई कहती है - एक तुम भी क्षत्रिय हो और एक वे भी क्षत्रिय थे |
चित्रपट चल रहा था दृश्य बदलते जा रहे थे |
स्व. श्री तन सिंह जी , बाड़मेर




मेरी शेखावाटी: कसर नही है स्याणै मै
ताऊ डॉट इन: ताऊ कवि सम्मेलन, ताऊ रामायण "
ललितडॉटकॉम: हमारे कंप्यूटर की हार्ड डिस्क की जघन्य हत्या.

6 comments:

आभार....आभार...सचमुच इतिहास आंखों के सामने नाच उठा..अगली कङी की प्रतिक्षा मैं

बहुत आभार, इतिहास जीवंत हो रहा है.

रामराम.

बहुत सुंदर ओर जिवांत. धन्यवाद

ओह! जैसलमेर! नहीं नहीं, भोजमेर!

ऐतिहासिक चित्रपट है | सुन्दर लेखनी |

बहुत सुंदर ओर जिवांत. धन्यवाद

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