भाग -१ ,भाग-२ ,भाग-३ का शेष ...........
चित्रगुप्त ने चंद्रसेन की ओर देहकर फिर कहना शुरू किया ....
एक दिन इसने सोचा -क्यों नहीं रक्षा के आक्रमणात्मक पहलु पर विचार किया जाये और उसके घोड़े अजमेर की ओर मुड गए | सरवाड़ के शाही थाने में एक दिन बड़ी अवर कुहराम मच गया | 'भागो ,भागो ! जान बचाओ ! या अल्लाह ,चंद्रसेन आ गया है | मुल्लाओं की घिग्घी बंध गयी , रोते हुए बच्चे चुप हो गए , दौड़ते हुए शत्रुओं की किसी की टोपी किसी का जूता तो किसी का शस्त्र गिर जाता था पर वे किसी तरह जान बचाकर भागे जा रहे थे | चंद्रसेन का इतना आतंक फैला कि उसका नाम सुनकर शाही कर्मचारियों की पिंडलीयां कांपने लग जाती थी | अकबर ने पायन्दा मोहम्मद खां को भेजा किन्तु चंद्रसेन अजमेर लुटता हुआ अरावली की घाटियों में जा पहुंचा |
चित्रगुप्त ने निश्वास खिंच कर चंद्रसेन की उन्नीसवीं लड़ाई का हाल कहना शुरू किया |
' धर्मराज ! राव चंद्रसेन की अंतिम रणस्थली सोजत थी | शत्रु की वहां भी करारी मात हुई | चंद्रसेन की लपलपाती तलवार के आगे सोजत ने आत्म समर्पण कर दिया | उसके जीवन की पहली और अंतिम लड़ाई सोजत में हुई |
' राजगद्दी उन्नीस वर्ष पुरे हुए और आपने इसे यहाँ बुला लिया , सारन के पहाड़ों में सचियाय गांव क्व निवासियों ने चंद्रसेन के अंतिम दर्शन किये और इसकी चिता के साथ पांच सतियों ने जलकर अपनी ज्योति अखंड ज्योति में मिला दिया |
' धर्मराज ! भगवान् की अनोखी कृतियाँ इस संसार में स्वतंत्रता की पूजा करती आई है और करेंगी | संसार के हर कोने में देश भक्त अपने देश की स्वतंत्रता के लिए युद्ध करते आये है और करेंगे भी , लेकिन चंद्रसेन की भांति उपेक्षित , नि:सहाय, निर्धन और एकाकी होकर भी मातृभूमि के लिए उन्नीस वर्षों तक अंगारों पर सो कर राष्ट्रीय और जातीय गौरव पर जीवन देने वाले बहुत कम मिलेंगे |
इतना कह कर चित्रगुप्त चुप हो गया |
धर्मराज ने चंद्रसेन की आत्मा को संबोधित करते हुए कहा - ' तुम्हे तुम्हारी इच्छा का लोक दिया जायेगा | बोलो कोनसा लोक चाहते हो ?
चंद्रसेन ने कहा ,- भगवन ! मुझे मृत्युलोक चाहिए !
उत्तर को सुनकर यमराज और चित्रगुप्त दोनों ही चौंक पड़े | चंद्रसेन ने कहा - भगवान् ! मेरी मातृभूमि अपने कल्याण के लिए कराह रही है | यवनों के अपवित्र शासन से मुक्त होकर जब तक मेरे देश बन्धु स्वतंत्र्ताकाश में स्वतंत्रता से सांस नहीं लेंगे तब तक मुझे सत्यलोक में भी शांति नहीं हो सकती | भारत की स्वतंत्रता मुझे पुकार रही है , मेरी पेतृक और परम्परा प्राप्त भूमि के अपहृत अधिकार मुझे कोस रहे है , मेरे जीवन का अधुरा स्वप्न मुझे मेरी प्रतिज्ञा याद दिला रहा है,परकीय शासन मेरी शक्तियों को ललकार रहा है | यदि एक बार मुझे वापस भेज दो तो मै अपने मन की निकल लूँ | सिर्फ पांच साल के लिए भेज दो , यदि आपका अनुग्रह हो तो मै मृत्युलोक ...............................................|
' धन्य है , चंद्रसेन , धन्य है ! तुम तो देवताओं के देवता हो | अब मृत्यु लोक में तुम्हारा छोड़ा हुआ अधुरा कार्य मेवाड़ के महाराणा प्रताप करेंगे | उसके बाद भी कई क्षत्रिय व देशभक्त योद्धा जन्म लेकर इस संघर्ष का ज्वलंत और जीता जागता इतिहास बनायेंगे | एक दिन आएगा जब तुम्हारी संतान भारत-भूमि को देवभूमि बनाकर छोड़ेंगे | तुम निश्चिंत होकर ब्रह्मलोक में आओ |'
इस आश्वासन से चंद्रसेन को कुछ संतोष मिला और उस दिन से वे ब्रह्मलोक में बैठे हुए इतिहास की उथल पुथल को देख रहे है |
यमराज की धर्मपत्नी में कहा - ' नाथ आज इतनी देर से कैसे आये ? और वह वीरता का साकार सा रूप आपके न्यायालय में कौन खड़ा था जिसके लिए आपने आज अप्रत्याशित रूप से इतना अधिक समय लगाया है ?
यमराज ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया - ' वह भी एक क्षत्रिय था |'
चित्रपट चल रहा था और दृश्य बदलते जा रहे थे |
समाप्त |
स्व.श्री तन सिंह जी द्वारा लिखित 
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6 comments:
बहुत बढ़िया श्रृंखला रही...आभार!
बहुत लाजवाब श्रंखला.
रामराम.
श्रृंखला बढ़िया रही!
बढ़िया ....
सचमुच वो एक क्षत्रिय ही था |
सचमुच वो एक क्षत्रिय ही था |
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