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Feb 2, 2010

सुख और स्वातन्त्र्य -3

भाग-१भाग -२ से आगे ...........
चित्रगुप्त कहे जा रहा था -
' अजमेर से अकबर ने अपनी सेना की दुर्दशा का हाल सुना तो तैयब खान , खुर्रम अजमत खान आदि को दुगुनी फ़ौज देकर भेजा | चंद्रसेन ने रामपुरा की पहाड़ियों की शरण ली और शाही फ़ौज अपने आपको विजयी समझकर लौट गई लेकिन अकबर ने बहुत फटकारा . ' सिवाणे आदि के किलों की मुझे जरुरत नहीं है ,मुझे जरुरत है चंद्रसेन के सिर की जो या तो मेरे आगे झुक जाये अन्यथा टूट जाये | परन्तु अकबर का वह अरमान कभी पूरा नहीं हुआ | इस चंद्रसेन का सिर न झुका न टुटा |
यमराज बड़े ध्यान से सुन रहा था और चित्रगुप्त बही खाते उलटता हुआ कहे जा रहा था --
' अकबर णे फिर प्रयास किया | इस बार जलाल खां और उसके साथ सैयद अहमद , हासिम और शिमाल खां भी थे | उन्होंने पहाड़ों की सब कन्दराएँ छान डाली | बादलों में चाँद की तरह कभी चंद्रसेन दिख जाता था और कभी लुप्त हो जाता था | जीवन के गहरे समुद्र में जीवट का यह खिलाडी कभी साँस लेने बाहर आता और फिर गहरा गोता लगा जाता था | शाही सैनिक बुरी तरह मार खा रहे थे , घोड़े थक गए थे और उनके सवार भी हैरान होकर जलाल खां के साथ वापिस लौट पड़े |'
यमराज के मुंह से एक बार फिर निकला - ' वाह !'
' सुराग लगने पर अलिकुली खां और बीकानेर के राम सिंह ने फिर जलाल खां को बुलाया | युद्ध हुआ और चंद्रसेन फिर पहाड़ों में अंतर्ध्यान हो गया | रामगढ़ के किले को भी छान डाला पर चंद्रसेन नहीं हाथ आया सो नहीं आया |'
चित्रगुप्त सुनाये जा रहा था -
' इतने में बगडी के ठाकुर देविदास ने आकर ठीक समय में सहायता दी | मध्य रात्रि के समय जब जब चाँद अँधेरे में जंगल में भटक गया तो चंद्रसेन ने उसी अँधेरे में जलाल खां को ढूंढ़ निकाला | तलवार के एक ही वार से जलाल खां के तीन जलाल खां हो गए | ऐसी करारी मात पर जलाल खां की कब्र अब भी सिसकियाँ भर रही है और उसकी आत्मा बादशाहों के बादशाह को अपनी पराजय का दर्दनाक विवरण सुनाने के लिए क़यामत के दिन की प्रतीक्षा कर रही है |
चित्रगुप्त भावावेश में धाराप्रवाह रूप से कहे जा रहा था -
' चंद्रसेन देवकोर के किले में चला गया परन्तु जलाल खां की मौत शिमाल खां के गाल पर करारी चपत थी और इसलिए शाही सेना ने देवकोर के किले की ईंट ईंट बिखेर दी परन्तु भीतर चंद्रसेन नहीं केवल निराशा मिली | शिमाल खां सिर पीट कर रह गया | यह चंद्रसेन तो तूफान के समान शत्रु पर आता था और घात करके पलक मारते ही पवन के समान उड़ जाता था | शत्रु विस्मय विमुग्ध थे |'
यमराज सुन रहा था और चित्रगुप्त कहे जा रहा था -
' पिपलोद के पहाड़ों में शाही सेना से फिर मुटभेड हो गई | चंद्रसेन की तलवार से शत्रुओं की संख्या निरंतर कम होती जा रही थी | सैकड़ों कठिनाईयां सह कर स्वतंत्रता का यह अद्वितीय प्रेमी अकबर के आगे झुकना राष्ट्रिय पाप समझता था | शाही सेना टूट गई , दिन टूट गए , पर्वत टूट गए , आशाओं के बाँध टूट गए पर चंद्रसेन नहीं टुटा |'
चित्रगुप्त ने चंद्रसेन की ओर देख कर फिर कहना शुरू किया ---
क्रमश:



ताऊ डॉट इन: ताऊ पहेली - 59
एलो वेरा के बारे में महापुरुषों के विचार |

3 comments:

क्रमश: का इन्तजार......

बढ़िया..जारी रहिये.

बहुत बढिया श्रंखला है, आगे का इंतजार है.

रामराम.

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