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Feb 18, 2010

वह राम ही था –२

भाग -१ से आगे .....

जिसने रावण जैसे आततायी को भी मारने से पहले उसे सुधरने का मौका दिया और युद्ध टालने की हर संभव और उचित चेष्टा की -
लक्ष्मण के मूर्छित होने पर जिस भाई की आँखों में प्रेमाश्रुओं की अविरल धारा बहने लगी और जो संयोग-वियोग रहित होकर भी साधारण लोगों की भांति फूट-फूट कर विलाप करने लगा -
अपनी ही प्रियतमा पर अटूट विश्वास होते हुए भी पुनर्मिलन पर उससे अग्नि में अपनी पवित्रता को तपा कर जिसने निष्कलंकता का प्रमाण माँगा - वह राम ही था |
जिसने वैभव संपन्न स्वर्णिम लंका पर विजय प्राप्त करने पर भी उस राज्य को पराजित रावण के भाई विभीषण के लिए त्याग दिया -
जिसने लोक मर्यादा कायम रखने के लिए परीक्षित सीता जैसी पतिपरायण पत्नी को केवल लोकरंजन के लिए अपने हृदय पर पत्थर रखकर सदा के लिए निर्वासित किया -
तीन लोकों का अधिपति और सर्वसमर्थ होकर भी जो जीवन भर दुखों और कष्टों की आग में जलता रहा - वह राम ही था |
जिसने अकेले ही हजारों अजेय राक्षसों का संहार किया -
जिसने कर्तव्य की कठोरता को भावनाओं की कोमलता के आगे कभी झुकने नहीं दिया और कर्तव्य की घडी उपस्थित होने पर अपने ही खून के टुकड़ों का खून करने के लिए , अपने ही हाथों अपने वंश को निर्वंश करने के लिए , जीवन की सुरम्य वाटिका में आग लगाकर अपने ही हाथों उजाड़ने के लिए लव और कुश जैसे पुत्रों से युद्ध करने के तैयार हो गया - वह राम ही था |
जिसके महान चरित्र पर कलम चलाकर संस्कृत में वाल्मीकि , अवधि में गोस्वामी तुलसीदास और खड़ी बोली में मैथिलीशरण गुप्त महाकवि बन गए और जिसका मुक्तक वर्णन कर कई तुकबंदी करने वाले भी कविराज बन गए , उस दिव्य चरित्र का अधिष्ठाता जो था - वह राम ही था |
वेद और पंडित जिसका आज भी वर्णन करते थकते नहीं , मुनिगण अपने चित्त को एकाग्र कर जिसका आज भी ध्यान धरते है और जिसकी भक्ति में भक्तों ने इस पुनीत भारत में भक्ति की सुरसरी बहाई है - वह राम ही था |





ताऊ डॉट इन: विशेष ब्लागर सम्मान पुरस्कार - 2010 की घोषणा.
कसर नही है स्याणै मै
एलो वेरा जेल ह्रदय रोगी के लिए आशा की नई किरण

15 comments:

राम तो पारस पत्थर हैं, जिन्होने स्पर्श किया वे कुंदन हो गए।

थोड़े महँ जानिहहिं सयाने ।

बिलकुल सही कहा आप ने, लेकिन आज लोग राम मै भी कमियां निकालते है

बिल्कुल सही वर्णन..जय श्री राम!

"लक्ष्मण की मृत्यु पर जिस भाई की आँखों में प्रेमाश्रुओं की अविरल धारा बहने लगी और जो संयोग-वियोग रहित होकर भी साधारण लोगों की भांति फूट-फूट कर विलाप करने लगा "

शेखावत जी एक अनुरोध था, उपरोक्त पहली लाइन को सुधार दे तो बेहतर रहेगा क्योंकि मृत्यु और मूर्छित होने में बहुत अंतर है और कथा को भ्रामक बना रहा है !

धन्यवाद !

This comment has been removed by the author.

ध्यान दिलाने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद गोदियाल जी |

मर्यादापुरुषोत्तम श्री रामचन्द्र की जय हो!

बहुत अच्छी प्रस्तुति।
इसे 20.02.10 की चिट्ठा चर्चा (सुबह ०६ बजे) में शामिल किया गया है।
http://chitthacharcha.blogspot.com/

बहुत सुन्दर! राम का चरित्र मनुष्यता का आदर्श है। वह आदर्श जिसे पाने में कई जन्म लग जायें।

इन्ही सब गुणों के कारण उन्हें पुरुषोत्तम कहा गया है. अच्छा लिख रहे हैं आप.

राम नाम की महिमा तो सनातन है, अनंत है जहाँ तक बखान की जाए कम है |

hmmmmmmm wo ram hi the.......

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