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Feb 11, 2010

उत्तरा की मांग -2

पिछले का शेष .....
और विदा पाकर अभिमन्यु तीर की भांति चला युद्ध क्षेत्र में |
'सप्य्क सप्य्क क्लाक ' तलवार चल रही थी जैसे मछली पानी में क्रीडा कर रही हों | सधे हुए हाथो से छूटे हुए ब्रह्मास्त्र की भांति वह टूट पड़ता था और जिस पर टूटता था उसके जीवन और मृत्यु को रौंद डालता था | भाद्रपद मास की कडकती बिजली के समान छोटे शिशु की भांति वह कड़क उठता था और जिस पर कड़कता था उसके भाग्य को कुचल डालता था ; क्रोधित रणचंडी के उद्दंड भैरव की भांति वह उछल पड़ता था | कौरवों के रथी , महारथी और अतिरथी विस्मयविमुध होकर किंककर्तव्यविमूढ़ हो गए | आकाश में दर्शनार्थी देवी देवताओं और यक्ष -गन्ध्रवों का जमघट लग गया था | वे कुहनियों के हल्के धक्कों से अपने लिए बनाये मार्गों पर पंजों के बल खड़े होकर देख रहे थे - युद्ध के मूर्तिमान अवतार को कुरुक्षेत्र की क्रीडा स्थली पर नर मुंडों से खेलते हुए और उधर विधाता क्रूरतापूर्वक खेल रहे थे अबोध पांडव कुमार के भाग्य से | तलवार टूट गयी तो उसने रथ का पहिया उठा लिया | वह आगे बढ़ना जानता था , हार कर जिन्दगी के लिए लौटना नहीं जानता था | वह प्रपंचो को तोड़ सकता था किन्तु उनकी रचना नहीं कर सकता था | वह भाग्य से अड़ना जानता था किन्तु उसे खुश नहीं करना जानता था |
हलाहल विष ने अमृत कलश को चारों और से घेर लिया | कौरवों के सात महारथियों के बीच अकेला अभिमन्यु इस प्रकार घिर गया जैसे सात निर्दयी यमदूतों के बीच किसी वीर पुरुष की अंतिम श्वास लोमहर्षक संघर्ष कर रही हो | अन्याय ने न्याय की छाती पर चढ़कर निर्लज्जतापूर्वक अपना सिर ऊँचा उठा लिया , कायरता ने बल के हाथों अपना सतीत्व लुटाकर वीरता को कुचल डाला , पशुता ने विजय के साथ गठबंधन कर पांडव कुल की निर्दोष दीप शिखा को बुझा दिया | एक और धर्मक्षेत्र में धर्म-राज्य के लिए युद्ध हो रहा था और दूसरी और अवसर पाकर अधर्म फुफकारता हुआ हावी हो रहा था |
विधाता की वह अमूल्य कृति कौड़ियों के मूल्य बड़ी बेरहमी से लुटी गयी , रूद्राणी की वीणा का सबसे सुरीला तार आलाप भरते ही टूट गया | सुभद्रा की कोख और उत्तरा की मांग ने युद्ध के जाज्वल्यमान इतिहास में अनमोल कड़ी जोड़ कर सदा के लिए विदा ले ली | कुरुक्षेत्र की रणभूमि के चप्पे -चप्पे को याद है कि वह अभिमन्यु भी एक क्षत्रिय था |
चित्रपट चल रहा था और दृश्य बदलते जा रहे थे |




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8 comments:

अद्भुत मुग्ध करने वाली, विस्मयकारी।

धर्मयुद्ध हाल ख़तम कोनी हुयो ...
कलयुग री अवधि घणी ही लांबी ह...

बहुत सुंदर.

रामराम.

सुंदर लगी यह पोस्ट.

बहुत बढ़िया!
महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनायें!

बहुत अच्छी प्रस्तुति।
इसे 13.02.10 की चिट्ठा चर्चा (सुबह ०६ बजे) में शामिल किया गया है।
http://chitthacharcha.blogspot.com/

तन सिंह जी की लेखनी में विचारों की गति है |

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