साम्राज्य और स्वतंत्रता के बीच निर्णायक संग्राम चल रहा है और खानवा के युद्ध क्षेत्र में घोड़े दौड़ रहे है |
बङगङां बङगङां बङगङां |
' परन्तु मै कैसे सो रहा हूँ , कहाँ हूँ मै ? '
' महाराणा आप कालपी ग्राम के शिविर में है |'
'नहीं , गलत है | यह कैसे हो सकता है ? मेरे बिना खानवा के युद्ध क्षेत्र में फिर किसके घोड़े दौड़ रहे है |'
विष का प्रभाव अपनी सीमाएं लांघ चूका था | महाराणा सांगा के अधूरे अरमान पश्चातापों की बेबसी पीकर बावले हो उठे थे | खानवा का युद्ध उनके भाग्य की अभागी भूल के रूप में उनकी अंतिम स्मृति पर छा रहा था | परन्तु किसी को यह कहने का साहस नहीं हुआ कि खानवा के युद्ध क्षेत्र में दौड़ते हुए घोड़े शाश्वत थकान से हार कर उसी क्षेत्र में चिर विश्राम कर रहे है |
'बेचारी चारणी ने सच ही कहा था कि मेवाड़ का राज मुकुट इसे ही मिलेगा पर मेरे बड़े भाइयों को यह सहन नहीं हुआ | वे मुझ पर अकारण ही टूट पड़े | वे बड़े थे , मै उन पर वार कैसे कर सकता था ? मेरी एक आँख फूट गयी परन्तु उस फूटी हुई आँख से मुझे देश के होनहार का कुटिल व्यंग्य दिखाई दे रहा था , इसलिए मै उस भ्रातृप्रेम को काटना नहीं चाहता था | मै एक्य और संगठन चाहता था | भारत को आजाद देखना चाहता था | मैंने भाग कर वह लड़ाई बंद की | लोग मुझे कायर कहेंगे पर मुझे तनिक भी चिंता नहीं , क्योंकि मैंने उस संगठन को क्रियात्मक रूप से कर दिखाया जिसका कि मै हिमायती था | इसलिए तो खानवा के युद्धक्षेत्र में आज इतनी अधिक संख्या में घोड़े दौड़ रहे है |'
बङगङां बङगङां बङगङां |
' महाराणा .........................!"
'मेरी यह विजय कितनी महान होगी क्योंकि इसे महान बनाने में स्त्रियों ने अपने गहने बेचकर द्रव्य दान दिया | सभी रजवाड़ों के राजा ही नहीं , नगर-नगर , गांव-गांव और झोंपड़ी-झोंपड़ी से चल फिर सकने वाले प्रत्येक राजपूत ने इसे महान बनाने के लिए सहयोग दिया | आज यह फ़ौज मेवाड़ की फ़ौज नहीं ,समस्त राजपूतों है , समूचे भारतवर्ष की फ़ौज है , विदेशी शासकों को भगाने के लिए स्वतंत्रता-प्रेमी देश भक्तों की फ़ौज है | देखो खानवा के युद्ध क्षेत्र में इन देशभक्तों के घोड़े कितने उत्साह से दौड़ रहे है |
बङगङां बङगङां बङगङां |
' महाराणा ! जरा शांत रहिए !'
हं हं ! शांत रहिए ! क्या यह शांति का समय है ? यह मेरी मातृभूमि , मेरी कौम और मेरी परम्परा के जीवन और मृत्यु का समय है | मेरे समस्त जीवन के प्रयासों के फलीभूत होने का तो समय ही अभी आया है | यह शांति की वेला नहीं क्रांति की बेला है | देख नहीं रहे हो ,क्रांति के हरकारों की तरह खानवा के युद्ध ख्सेत्र में घोड़े दौड़ रहे है |
बङगङां बङगङां बङगङां |
' इन बातों को बीते हुए तो सात माह हो गए , महाराणा !'
' हाँ, हाँ , सात दिन ही तो हुए है ! बाबर की घिग्घी बंध गई | उसके संधि प्रस्ताओं को मैंने ठुकरा दिया | स्वतंत्रता की संधियाँ नहीं हुआ करती | गुलाम लोग अपनी संघर्ष हीनता और कायरता के कारण सिद्धांतों का समझौता करते है | सात ही दिन हुए - निराश होकर बाबर ने प्याले तौड़ डाले | उसने कुरान को हाथ में लेकर शपथ खाई है कि मै कभी शराब नहीं पिऊंगा , पांच वक्त नमाज पढूंगा और ईमान रखूँगा | वह शराब नहीं पिएगा ,पांच वक्त नमाज भी पढ़ेगा और इमानदार भी बना रहेगा पर तब तक , जब तक खानवा के युद्ध क्षेत्र में हमारे घोड़े दौड़ते रहेंगे |'
बङगङां बङगङां बङगङां |
' महाराणा ! पानी पियेंगे ?'
'पानी नहीं , खून पीना चाहता हूँ खून ! बाबर की छाती का खून पीना चाहता हूँ | ला सकते हो क्या ? मेरी प्यास न पानी से बुझने वाली है और न आंसुओं से | पृथ्वीराज की फोड़ी गई आँख से बहता हुआ खून , तैमूर के अत्याचारों से बहता हुआ आर्य रक्त मूलधन सहित ब्याज चाहता है और मैंने इसी ब्याज को चुकाने के लिए बाबर पर उस वक्त आक्रमण किया था जब वह इब्राहीम लोदी से लड़कर थक गया था | मैंने ठीक समय पर वार किया था | मेरे घोड़ों की टापें समय की पहचान जानती है | यदि भाग्य को वीरों की पहचान नहीं है तो इसमें मेरा क्या दोष ? मेरे घोड़े तो भाग्य से जूझने के लिए खानवा के युद्ध क्षेत्र में दौड़ रहे है '-
बङगङां बङगङां बङगङां |
क्रमश:...................
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आँखों की रौशनी को रखें हमेशा जवान
दरद दिसावर
पालतू कुत्ते या फिर पालतू आतंकी ?
1 hour ago





6 comments:
खुन की प्यास पानी से नही बुझ सकती।
महाराणा नाम इसीलिए इतिहास मे अमर है।
अपने देश को विदेशी ताकतों से बचाने का बलिदान अमर है।
आज देश को विदेशीयों के हाथों मे ही दे दिया गया है।
बढिया पोस्ट आभार
बहुत अच्छा लिखा आप ने, तभी ति हम सब महा राणा जी का नाम गोरव से लिया जाता है,
बढिया पोस्ट........
बहुत सशक्त आलेख, नमन उन रणबांकुरों को.
रामराम.
बढिया पोस्ट आभार....
इस कृति को नेट पर लाने का आभार
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