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Jan 13, 2010

दुर्भाग्य का सहोदर

एक ओर सात और दूसरी ओर ग्यारह अक्षौहिणी सेना के बीच जीने और मरने की बाजी लग रही है | महाभारत का युद्ध चल रहा है | शस्त्र झनझना रहे है और शंख व रणभेरियाँ बज रही है |
यह कष्ट सहिष्णु कर्ण है |
' परशुराम से ब्रह्मास्त्र की विधि सिखने ब्राह्मण का वेश धारण कर गुरु का कृपा-भाजन बना | एक दिन गुरु इसकी जांघ पर सिर देकर सो रहे थे कि एक कीड़े अलर्क ने इसे काटना शुरू किया | कीड़ा काटते काटते मांस में घुस कर हड्डी तक को कुरेदने लगा | रक्त की धारा बह चली किन्तु गुरु की निंद्रा में विध्न न हो इसलिए बैठा रहा - अविचल पर्वत की भांति , विधाता के विधान की भांति और उत्तर दिशा के दिग्पाल की भांति डटा रहा |
' परन्तु दुर्भाग्य उसका सहोदर था इसलिए गुरु ने ऐसी गुरु भक्ति के लिए प्रसन्न होकर वरदान के स्थान पर क्रुद्ध होकर श्राप दे दिया | '
एक ओर सात और दूसरी ओर ग्यारह अक्षौहिणी सेना के बीच जीने और मरने की बाजी लग रही है | महाभारत का युद्ध चल रहा है | शस्त्र झनझना रहे है और शंख व रणभेरियाँ बज रही है |
यह कर्ण म़ातृ-भक्त भी है |
' यधपि इसकी माता कुंती ने इसके जन्म से ही इसे त्याग दिया -पेटी में बंद कर नदी में बहा दिया था - मौत के मुंह में , मौत और भाग्य से संघर्ष करने के लिए |
' यधपि लक्ष्यवेध होने पर द्रोपदी का अधिकारी हो गया था | किन्तु इसकी माँ ने इसके जन्म के भेद को गुप्त रखा इसलिए स्थान-स्थान पर सूतपुत्र और अज्ञातकुलीन का बताया जाकर वह अपमानित होता रहा |
'यधपि वह माँ की गोद के लिए जिन्दगी भर ललचाता रहा , कुल के रहस्य की जिज्ञासा की वेदना में अनवरत जलता रहा और माँ ने उसको सम्पूर्ण आयु में एक बार भी बेटा कहकर स्नेह से नहीं पुचकारा |
'यधपि उसी की कोख में जन्म लेकर और पाँचों का सहोदर होकर भी कुंती ने उसे सदा उपेक्षित ही रखा | वह उन पांचो की हितकामना में ही सदा लगी रहती थी |
' तथापि जब वह अपनी गोद में अभय के लिए भीख मांगने आई तब वह ना नहीं कर सका | उसने उसके चारों बेटों पर आघात न करने का वचन दिया और उस वचन को निभाया |
'परन्तु दुर्भाग्य उसका सहोदर था | ऐसी म़ातृ-भक्ति के बाद भी माता ने अपने पाँचों पुत्रों को यह भेद नहीं बताया और जब वह रथ का पहिया ठीक कर रहा था तब अर्जुन उसके बंधू ने ही रण-नियमों का उलंघन कर कपट से उसे मार डाला | '
एक ओर सात और दूसरी ओर ग्यारह अक्षौहिणी सेना के बीच जीने और मरने की बाजी लग रही है | महाभारत का युद्ध चल रहा है | शस्त्र झनझना रहे है और शंख व रणभेरियाँ बज रही है |
यह कर्ण सत्यवादी भी है |
' जब उसे मालूम हो गया कि वह कुंती पुत्र है , अर्जुन भीम आदि उसके भाई है |
' जब उसकी माता ने आकर उसे पांडव पक्ष की ओर से युद्ध करने का आग्रह किया |
' जब उसके रुंधे हुए भ्रातृप्रेम का प्रवाह रोम-रोम में प्रवाहित हो उठा |
तब उसने भावनाओं से भरी मातृदृष्टि से मुंह फेर कर उत्तर दिया था - कर्ण मझधार में घोड़े नहीं बदलता | जिसका साथ देने का एक बार वचन दे दिया है फिर किसी भी भयानक परिणाम से डरकर कायर की भांति परिस्थितियों का मूल्याङ्कन करना कर्ण को शोभा नहीं देता | अपनी माँ , जिसके लिए मेरा हृदय जिन्दगी भर तडफता रहा है , भाई जिन पर मुझे गर्व होना चाहिए अथवा और किसी सम्बन्धी के लिए मै दुर्योधन का साथ नहीं छोड़ सकता | मृत्यु पर्यंत जिसका साथ देने का निश्चय मैंने कर लिया है उस निश्चय की चाहे जितनी कीमत चुकानी पड़े , कर्ण उसके लिए सदैव तैयार रहेगा |
' परन्तु दुर्भाग्य उसका सहोदर था | ग्यारह अक्षौहिणी सेना होकर भी द्रोण , भीष्म आदि जैसे महारथियों के सेनापति होते हुए भी दुर्योधन की पराजय हुई | सूर्य और कुंती का सत्यवादी पुत्र , सूतपुत्र के असत्य नाम सम्बन्ध का अपने आप नाम से विच्छेद नहीं कर सका | '
क्रमश:



अरे ताऊ "गंभीर देवी तुमको जीने नही देगी और मुस्कान देवी तुमको मरने नही देगी."
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8 comments:

रोचक है,अगली कड़ी का इन्तजार.

सूत पुत्र न जाने क्या क्या नही सुना कर्ण ने . लेकिन क्षत्रीयत्व वरकरार रहा .आखिर खून क असर तो रहता ही है

बहुत रोचक हमेशा की तरह से. धन्य्वाद

वाकई बहूत ही मजेदार कहानी है वीर क्षत्रिय कर्ण की जो उपेक्षित होकर भी बहूत ही महान योद्धा माना जाता है|

यह कष्ट सहिष्णु कर्ण है |
यह कर्ण म़ातृ-भक्त भी है |
यह कर्ण सत्यवादी भी है |

sundar

बहुत शानदार. धन्यवाद.

रामराम.

कर्ण के गुणों के बारे में जितना बताया जाए उतना ही कम है |

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