शनिवार , ८ जनवरी सन १०२६ की उषा काल के अंतिम प्रहर में जब सूर्य अंगडाई लेकर अपने अपने बिस्तर पर करवट बदल रहा था , तब मंदिरों में घन घन कर टंकारे और हिन् -हिनाती तुर्र्हियाँ चीख रही थी - "जय सोमदेव ! "
सूर्य ने कसूमल रंग की चादर उठाकर अपना मुंह बहार निकाला तो उन्हें शत शत कंठो की गगन-भेदी ध्वनी सुनाई दी - " जय सोमदेव ! "
शत्रु के रक्त की प्यासी होकर तलवारें प्रभात काल में सहस्त्रों बिजलियाँ -सी कड़क रही थी और प्रत्येक कड़क के साथ लोमहर्षक रणघोष हो रहा था - " जय सोमदेव !"
तीरों के बादल छा गए और मानवता के निकलते हुए जनाजे को देखकर आकाश के बादल कलप-कलप कर आंसू बहा रहे थे | हवाएं विलाप कर रही थी - "जय सोमदेव !"
प्रेम और शांति रूपी पुत्रों के अवसान पर धरती माता के गालों पर लाल रंग के आंसुओं की कल कल कर धाराएं बह रही थी और हिचकियाँ सुबक रही थी - "जय सोमनाथ ! "
गरम गरम रक्त के समुद्र में जीवन नौका की पतवारें छप-छप कर चल रही थी और गिद्ध मांस नोचते हुए कह रहे थे - ' जय सोमनाथ ! "
पताकाएँ टेढ़ी मेढ़ी होकर फरफरा रही थी और उनसे व्याकुल होकर व्योम धरती का चुम्बन लेता हुआ बोला -" जय सोमनाथ ! "
इतिहास के पन्नो पर अंकित होने वाले ऐसे असामन्य दृश्य को देखने के लिए सूर्यदेव अपने रथ पर हडबडा कर सवार होते हुए अपनी प्रशंसा प्रगट करने लगे - धन्य है धरती के पुत्रो को - " जय सोमनाथ ! "
लम्बे काल की प्रतीक्षा के बाद कालिका का खप्पर आज भरा जा रहा था और वह तृप्त होकर डकारें ले रही थी - " जय सोमनाथ ! "
प्रलय के तांडव नृत्य की मुद्रा में स्वयं भगवान सोमनाथ भीमदेव के रूप में गरज रहे थे | उनके गंभीर कंठश्रोत से सृष्टि को थरथराने वाली ध्वनि निकल रही थी - " जय सोमनाथ ! "
भीमदेव की रक्त रंजित तलवार के प्रत्येक वार के साथ धरा धसक रही थी और धसकते हुए कराह रही थी - ' जय सोमनाथ ! '
श्मशान घाटों पर सोये हुए कई राख झड़का कर समाधियों से बाहर निकलते हुए नारा लगाने लगे - ' जय सोमनाथ ! '
क्रोधित तूफ़ान में समुद्र की लहरों सी सरसराती हुई शत्रु सेना अपने भाग्य के किनारों से टकरा रही थी और उसकी प्रत्येक पछाड़ के साथ ध्वनि आ रही थी - 'जय सोमनाथ !'
पुजारी के भेद और क्षत्रिय के दुर्भाग्य ने मंदिर के लोह कपाटों पर बल लगाया और वे टूटते हुए चरमराये -' जय सोमनाथ !'
विजय और भाग्य अपनी गठरियाँ संभाल कर भीमदेव से विदा लेने लगे - ' जय सोमनाथ ! '
नियति ने क्रूर व्यंग्य पर मुस्कराकर होनहार से टक्कर लेने की सोचकर भीमदेव ने भी विदा का हाथ उठाया - ' जय सोमनाथ ! '
मृत्यु और पराजय ने काले वस्त्र धारण कर मंदिर में प्रवेश किया और भीमदेव से अभिवादन करने लगे - ' जय सोमनाथ ! '
असंख्य नरमुंड ओलों के समान बरस रहे थे और स्वर्ग से विमान उड़ने की तैयारी में शीघ्रता का संकेत कर रहे थे - ' जय सोमनाथ ! '
लेकिन भीमदेव तन्मय और एकाग्र होकर नरसंहार का योगाभ्यास कर रहा था | हठात जीवन संध्या मृत्यु से अंतिम विदा लेने लगी - ' जय सोमनाथ ! '
और
' जय सोमनाथ ! '
भीमदेव का कटा हुआ मस्तक भगवान सोमनाथ के चरणों में गिर पड़ा | रक्त की धारा अभिषेक करने लगी - ' जय सोमनाथ ! '
इस नश्वर शरीर का यह तुच्छ मस्तक और मेरे रक्त के साथ मेरा आखिरी अरमान भी है , हे कुल देवता ! तुम्हे भेंट है |
' जय सोमनाथ ! '
मंदिर की ईंट-ईंट बिखर गई | उसके सोने चाँदी के अलंकार व रत्न लादे जा रहे थे | लदे हुए ऊँटो ने अरडाट की - ' जय सोमनाथ ! '
धर्म के नाम पर धर्म कचोटा गया , धर्म के नाम पर धरती की कोख सूनी हो गई , धर्म के नाम पर बलिदान को बलि चढ़ा दिया गया , यज्ञ की अंतिम स्वाहा में पूर्णाहुति का मन्त्र गूंजा - ' जय सोमनाथ ! '
गुर्जर देश के सूर्य ने फिर बिस्तर में घुस कर लाल चादर ओढ़ ली | मंदिर शमशान बन चूका था और सियार चिल्ला रहे थे - ' जय सोमनाथ ! '
रात का सन्नाटा दबे पांव घूम घूम कर देख रहा था - संहार के वीर्य से उत्पन्न चिर शांति के एकछत्र साम्राज्य को - ' कौन है सम्राट ? कहाँ गया वह ? अँधेरे ने पहचान कर कहा - ' जय सोमनाथ ! '
अर्ध रात्री को गगन के परदे हटा कर स्वयं सोमनाथ ने अपनी रजत आँखों से आश्चर्यवत देखा अपने नाथ और उसके सेवको को स्वर्ग में हिलमिलकर नृत्य करते हुए | भूत प्रेत गण जय जय की ध्वनि से ताल दे रहे थे - ' जय सोमनाथ ! '
पार्वती ने पूछा - ' भगवन ! वह कौन था ? आपके ही क्रोध की भ्रकुटी के समान न मौत से डरता था , न तीर और तलवार से | न खून और संहार से डरता था , न प्रलय और पराजय से | रक्त की अंतिम बूंद , जीवन के अंतिम श्वास , यहाँ तक कि मृत्यु के बाद भी लड़ता हुआ बोल रहा था -' जय सोमनाथ ! '
गणेश जी बीच में ही बोल उठे - ' वह एक क्षत्रिय था | '- ' जय सोमनाथ ! '
बाड़मेर के पूर्व सांसद स्व. श्री तन सिंह जी द्वारा लिखित
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मत पूछै के ठाठ भायला - कविता
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जय सोमनाथ !
Ratan Singh Shekhawat, Jan 12, 2010
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बहुत सजीव चित्रण। बहुत अच्छा लगा पढ़कर।
जय सोमनाथ-बहुत उम्दा आलेख. स्व. तन सिंह जी लेखनी अद्भुत थी.
बहुत सुंदर लेख लिखा, स्व तन सिंह जी को नमन, ओर आप का धन्यवाद इस लेख को हम तक पहुचाने के लिये
जय- सोमनाथ .
बहुत सुंदर आलेख,
रामराम.
रोमांचक! अद्भुत लेखन!
बहुत सार्थक!
लोहिड़ी पर्व और मकर संक्रांति की
हार्दिक शुभकामनाएँ!
गज़ब क्या पोस्ट लिखी है.
बिना टिप्पणी दिए रहा नहीं गया. :)
मकर संक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएं.
जय- सोमनाथ .