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Jan 4, 2010

लग्न की परीक्षा

क्रोधित होकर आवा धधक रहा था | जिन्दगी दुबक कर घड़ों में छिपी हुई बैठी थी और बाहर मौत लपलपाकर अपना नाक चाट रही थी | तीन दिनों तक वह गुर्राती रही और प्रभु के राज्य की नींव अंतरतम की गहराइयों में लगती जा रही थी | शिलान्यास हो चूका था | पार्थिव और लौकिक धारणाओं की छाती पर अपार्थिव और अलौकिक विश्वास की प्राण प्रतिष्ठा हो चुकी थी | बिल्ली के नन्हे नन्हे बच्चे म्याऊँ म्याऊँ करते पूंछ हिलाते और दांत निपोरते हुए बाहर आ गए | एक सच्ची लग्न का जन्म हुआ | मंगल महोत्सव सशरीर प्रगट हो गया था | उसी लग्न को फुफकारते विषधरों के सन्मुख डाला गया , गहरे समुद्रों में फैंका गया , ऊँचे पहाड़ों की चोटियों से गुडाया गया , मतवाले हाथियों के पैरों तले कुचलवाया गया , वर प्राप्त होलिका के साथ दहकती अग्नि में तपाया गया परन्तु उसे न सांप खा सके , न सागर डुबो सके , न पहाड़ तोड़ सके , न हाथी कुचल सके और न आग ही जला सकी |
लग्न की अंतिम परीक्षा की घडी उपस्थित हुई | आज उसके समक्ष पिता की श्रद्धा पुत्र की निष्ठा को पराजित करने पर तुली हुई थी | व्यष्टि और परमेष्टि की दूरी के बीच भावनाओं की तराजू के पलड़े कभी इधर कभी उधर झूल रहे थे | कर्तव्य उलझन में पड़ा हुआ बाल नोंच रहा था | निष्ठा ने भावनाओं को रोंद कर कर्तव्य से आलिंगन कर लिया | थम्भा चूर चूर हो गया | उसमे प्रगट हुआ वह जो सर्वत्र होकर भी अप्रगट है | जुल्मों की कहानियां का उपसंहार हो गया | पाशविक बल ने अपने जीवन में एक बार और निर्बल दिखाई देने वाले आत्मबल के आगे घुटने टेक दिए | आज भी लोग उसी प्रह्लाद का नाम लेकर पुलकित हो रहे है , परन्तु वह प्रहलाद भी एक क्षत्रिय था |
चित्रपट चल रहा था दृश्य बदलते जा रहे थे |

स्व. श्री तन सिंह जी


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7 comments:

बढियां है,स्वागत.

सुंदर काव्यात्मक चिंतन और कथा।

बहुत सुंदर वर्णन.

रामराम.

पुरामे आख्यान को नये ढंग से प्रस्तुत करने के लिए बधाई!

श्री तन सिह् जी के अन्य लेखों कि तरह ही यह भी बहुत अच्छा लेख है ।

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