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Jan 2, 2010

स्वधर्म-पालन

'इन देवदारु वृक्षों की रक्षा के लिए मै यहाँ स्वयं भगवान् पशुपतिनाथ द्वारा नियुक्त हूँ | आज सात दिनों की प्रबल भूख के पश्चात् मुझे यह गाय स्वयं प्राप्त-भजन के रूप में मिली है | तुम्हारे लिए गाय कुछ भी हो किन्तु मेरे लिए तो मेरा केवल भोज्य पदार्थ ही है | तुम्हारे शत्रुओं का मानमर्दन करने वाला यह अद्वितीय धनुष , भाग्य पर पुरुषार्थ का सिक्का जमाने वाले ये प्रचंड बलशाली बाहू और अनेक बार तुम्हे विजय श्री से विभूषित करने वाले तुम्हारे यह अचूक बाण मुझ पर काम नहीं देंगे , क्योंकि मै अपना धर्म पालन कर रहा हूँ | '
' पर मेरा भी तो कोई धर्म होगा ? '
'है क्यों नहीं |
' तो बताओ क्षत्रिय धर्म क्या है ? '
'रक्षा करना |'
' और जब किसी का स्वधर्म दुसरे के धर्म से टकरा रहा हो तब ? '
' तब मुर्ख आपस में लड़ने की चेष्ठा करते है और बुद्धिमान ऐसा मार्ग निकालते है जिससे दोनों का श्रेय साधन हो सके |
' तब मै भी एक मार्ग निकालता हूँ | वनराज ! तुम भूखे हो ,इस गाय को छोड़ दो और मेरे शरीर को खाकर भूख मिटाओ |'
सिंह अवाक रह गया | उसकी युक्ति में उसका ही गला फंस जाएगा ऐसी उसे कभी कल्पना ही नहीं थी | निरुत्तर होते हुए भी उत्तर दिया - ' तब तो तुम्हे मै बुद्धिमान मानकर ही मुर्ख मानता हूँ | तुम्हारे पास एक छत्र साम्राज्य , उमड़ता हुआ यौवन , ऋषि को संतुष्ट करने के विपुल साधन और अपरिमित तेज है | इस तुच्छ प्राणी के लिए इतना त्याग मैंने आज तक नहीं सुना | नरेश ! तुम लौट जाओ | तुम्हारा दोष नहीं है | न तुम्हारे शस्त्रों का दोष है | मुझे तो भगवान् का ऐसा ही वरदान है कि मुझपर कोई शस्त्र काम नहीं देता | तुम विवश हो इसलिए संतुष्ट होकर लौट जाओ |'
' इसका अर्थ हुआ मैंने प्रकृति के वश होकर क्षत्रिय के घर जन्म लिया और अब परिस्थितियों से परवश हो क्षत्रिय धर्म त्याग दूँ | विवशता से उचित कार्य का त्याग संघर्ष हीनता और कायरता है | ऐसे साम्राज्य के विवश सम्राट को धिक्कार है | ऐसे यौवन , साधन और तेज को भी धिक्कार है ! मै ऐसी विवश जिन्दगी की अपेक्षा वश प्राप्त मृत्यु को अच्छी समझता हूँ | भीख मांग कर जो सम्राट बनते है वे अत्यंत दीन है | साम्राज्य तो मौत का सिर तोड़ कर बनाये जाते है | तुमने ऐसा त्याग नहीं सुना किन्तु राजा शिवी तो केवल कबूतर के लिए अपने आप को समाप्त करने पर उतारू हो गए थे | मृगराज ! मेरे वंश में इक्ष्वाकु हुए है , पृथु , मान्धाता और स्त्यवृति हरीश चन्द्र हुए है | यह रघुकुल है | इसमें भागीरथ होगा , राम होगा , लव-कुश होंगे और भी न जाने कितने ही महापुरुष एवं हुतात्मा होंगे | मेरे ही पूर्वज और मेरी ही संतति मुझे दास कहे ऐसे जीवन से मौत कहीं अच्छी है |'
और उस नरेंद्र में मृगेंद्र के समक्ष अपने ही शरीर को समर्पित कर दिया | भय उसी से भय खाता है जो भय से भय नहीं खाता | परीक्षा पूर्ण हुई | परीक्षार्थी उत्तीर्ण हो गया और परीक्षक हार गया | स्वधर्म पालन की प्रेरणा के इतिहास में एक और पृष्ठ जुड़ गया , जिस पर आज भी लिखा हुआ है ' दिलीप नि:संदेह एक क्षत्रिय था | '

स्व.श्री तन सिंह जी द्वारा 'बदलते दृश्य' पुस्तक में




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11 comments:

आशा है एक नए उमंग की,

तरंग और उसके संवेग की॥

घूँघट उठाती दुल्हन २०१०...

और उसके स्पर्श की

मेरी दुल्हन २०१०

आपका स्वागत


तेज प्रताप सिंह

बहुत बेहतरीन आलेख!!

आपको भी नव वर्ष की बहुत बहुत बधाई ...

बहुत सुंदर, प्रेरक आख्यान।
नववर्ष पर हार्दिक शुभकामनाएँ! नया साल आप के लिए नयी खुशियाँ लाए।

बढ़िया आख्यान!

सबको मुबारक हो नया साल!

रतन सिंग जी, ज्ञान वर्धक आलेख, आभार
नूतन वर्ष की शुभकामनाएं अपार्।

बहुत सुंदर लेख. धन्यवाद

बहुत सुंदर आलेख, शुभकामनाएं.

रामराम.

kya ab aise log bhi bharatiy loktantr mne hai
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बहुत ऐतिहासिक प्रसंग को उकेरा है आपने,नव वर्ष की मंगल मय शुभकामनायें .

सुन्दर सुन्दर अति सुन्दर ।

बहुत सुन्दर
आप की रचना हमेशा अच्छी होती हैं

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