भाग -१ ,भाग-२ , भाग-३ का शेष ...............
वैध ने गिडगिडाकर कहा - ' महाराणा ! यह बातें सब बातें छोड़ दीजिए , ईश्वर का नाम लेने का समय आ गया है | '
'अच्छी बात है | हे प्रभु ! हे ईश्वर एकलिंग नाथ ! मुझे मोक्ष मत देना | वापस इसी संसार में इसी देश में भेजना | बाबर द्वारा दी गई पराजय मेरे हृदय को कचोट रही है , मैंने प्रतिज्ञा की है कि जब तक बाबर को नहीं जीतूँगा चितौड़ नहीं जाऊंगा | मैंने वेदना के सागर में निराशा की पतवारें लेकर इस जीवन के कुछ दिन रणथम्भोर में बिताये , केवल इस उम्मीद में कि जब तुम मेरी पुकार सुनोगे | आज मुझे मेरा चितौड़ बुला रहा है , रणभूमि बुला रही है , बाबर से बदला लेने की बात याद आ रही है और मै जीवन में पहली बार कृपाकांक्षी बनकर तेरी देहली पर पड़ा हूँ | काश , तुम एक बार मुझे लौटा सकते | परन्तु मै जनता हूँ तुम होनहार का बहाना करोगे , मेरे प्रारब्द को दोष दोगे , काल और मर्यादा की बात कहोगे परन्तु यह कभी नहीं कहोगे - उठो सांगा ! तुम्हे तुम्हारा कर्तव्य बुला रहा है | खानवा के युद्ध क्षेत्र में घोड़ों की टापें तुम्हे याद कर रही है |'
' यह क्या ? ओह ! आपने तो मेरे लिए स्वर्ग से विमान भेजा है - नहीं नहीं , मै जीवन भर घोड़े की पीठ पर चढ़ा हूँ | हाथ पैर टूटने के बाद भी पालकी में नहीं बैठा | मेरे लिए घोड़े भेजो , मै स्वर्ग की गली और घाटियों में घोड़े दौड़ाउंगा -
बङगङां बङगङां बङगङां |
और
बङगङां बङगङां बङगङां |
महाराणा रह गए और सांगा की आत्मा पवन के घोड़ों पर चढ़कर चली गई | आकाश मार्ग में अब भी टापें सुनाई दे रही है | चितौड़ दुर्ग अब भी महाराणा सांगा की प्रतीक्षा कर रहा है - ' कब आयेंगे सांगा ? बाबर को हराने की प्रतिज्ञा पूरी करने | ' दूसरी और मेवाड़ से कोसों दूर सांगा की देह मातृभूमि के लिए तरसती तरसती चिता में जल-जल कर राख हो गई | तीस जनवरी , १५२८ को इस बांके वीर की दर्दनाक कहानी लिखते लिखते विधाता की कलम का कलेजा चूर-चूर हो गया | उससे साढ़े सात माह पहले फतह पुर सीकरी से दक्षिण पश्चिम में १० मील दूर सन १५२७ की मार्च की १६ तारीख के दिन खानवा के युद्ध क्षेत्र में दौड़ते-दौड़ते घोड़े थक गए परन्तु अब भी हल्दीघाटी में महाराणा प्रताप चढ़े हुए है और उनके घोड़े दौड़ रहे है |
बङगङां बङगङां बङगङां | बङगङां बङगङां बङगङां |
हल्दीघाटी के घोड़े भी दौड़ते दौड़ते थक गए पर महाराणा राज सिंह अब भी चढ़े हुए है और औरंगजेब से युद्ध करने के लिए उनके घोड़े दौड़ रहे है |
बङगङां बङगङां बङगङां |
महाराणा राज सिंह के घोड़े भी थक गए पर महाराणा फतह सिंह के अब भी चढ़े हुए है और दिल्ली से लौटते हुए उनके घोड़े दौड़ रहे है |
बङगङां बङगङां बङगङां
महाराणा फतह सिंह के घोड़े भी थक गए पर कई कर्मवीर अब भी चढ़े हुए है कर्मक्षेत्र में उनके भी घोड़े दौड़ रहे है -
बङगङां बङगङां बङगङां |
और यह बङगङांट अब भी याद दिला रही है कि किसी दिन खानवा के युद्ध क्ष्तेत्र में भी घोड़े दौड़े थे -
बङगङां बङगङां बङगङां |
और यह भी याद दिला रही है कि उन घोड़ों को दौड़ाने वाले मेवाड़ के महाराणा संग्राम सिंह भी एक क्षत्रिय थे |
चित्रपट चल रहा था उअर दृश्य बदलते जा रहे थे |
समाप्त |
पूज्य स्व.श्री तनसिंह जी की कलम से ... 
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53 minutes ago





2 comments:
बहुत लाजवाब शोर्य गाथा.
रामराम.
पूरी श्रृंखला जबरदस्त रही बङगङां बङगङां बङगङां ..आनन्द आ गया.
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