ज्ञान दर्पण के लेख इन्टरनेट पर दुबारा कहीं भी प्रकाशित करना सख्त मना है| पर प्रिंट मिडिया में नाम सहित छापने की खुली छूट है|

Jan 21, 2010

बङगङां बङगङां बङगङां -3

भाग १भाग २ से आगे .........

' किसका इलाज करोगे वैद्यजी ? विष का प्रभाव संभवत: आप हटा सकते है | शरीर पर लगे अस्सी घाव भी आपने ठीक किये है परन्तु मेरे दिल के घावों का उपचार करोगे ? उनमे तो अब मवाद पड़ गई है | वैद्यजी अब तो मेरे उपचार के लिए स्वयम यमराज को ही आना होगा | कृपा कर उन्हें शांति के साथ आने दो | मै उनकी प्रतीक्षा में हूँ परन्तु जब तक वह न आये तब तक दो क्षण उन घोड़ों की आवाज सुनने दो जो खानवा के रणक्षेत्र में दौड़ रहे है '-
बङगङां बङगङां बङगङां |
'राणा जी ! आपके कान आपको धोखा दे रहे है |'
' क्यों नहीं देंगे ? मेरे सगे सम्बन्धियों ने धोखा दिया , मेरे साथी ने धोखा दिया , राजपूत सिपाही ने धोखा दिया | और मेरे सरदारों ने भी ऐसे कठिन समय में मुझे धोखा दिया , फिर यह कान मुझे धोखा क्यों नहीं देंगे ? परन्तु मैंने आज तक किसी को धोखा नहीं दिया | मैंने न इतिहास को धोखा दिया और न कर्तव्य को | मैंने उन असंख्य साथियों को भी धोखा नहीं दिया जिन्होंने मेरे कंधे से अपना कन्धा मिलकर मरने और जीने के भयानक जुए में अपने जीवन और सर्वस्व की बजी लगा दी थी |'
'महाराणा ईश्वर का नाम लीजिए |'
ईश्वर का नाम ! ह ह ! विजयी और महाराणा कुम्भा का उत्तराधिकारी पराजय का मुंह देखकर ईश्वर का नाम लेगा ? मै हार कर ईश्वर का नाम नहीं लिया करता , जीत कर उसके चरणों में सिर झुकाता हूँ | हार कर ईश्वर के सामने जाने में मुझे लज्जा आती है | हार कर मै स्वर्गस्थ विजयी पूर्वज महाराणा कुम्भा के समक्ष कैसे जाऊंगा ? मै लज्जित हूँ | जाने से पहले विजय स्तम्भ को तोड़ दो , मेवाड़ का इतिहास फाड़ दो , चितौड़गढ़ की एक एक ईंट को बिखेर दो , राजपूतों का सारा वंश मिटा दो , तब मुझे मरने में कोई लज्जा नहीं आएगी | फिर खानवा के रणक्षेत्र के घोड़े बड़ी शान से स्वर्ग की और मुड़ेंगे '-
बङगङां बङगङां बङगङां |
क्रमश :....................



मदिरा समाज और संस्कार दोनों के लिए अभिशाप है |
"कवि चोर करेलवी कैसे कहलायेंगे"?
लगाइए सर्च को धार - रिफाइन सर्च के चंद फॉर्मूले

7 comments:

हार कर ईश्वर के सामने जाने में मुझे लज्जा आती है..
itihaas aise nayko ko yaad karta hai.

राणा की कथा बहुत सही आगे बढ़ रही है...


मै हार कर ईश्वर का नाम नहीं लिया करता , जीत कर उसके चरणों में सिर झुकाता हूँ


ये शान होती थी///

जारी रहिये..हम भी सुन रहे हैं: बङगङां बङगङां बङगङां |

बहुत सुंदर ऎसी बात बहादुर ही कर सकते है, नमन है महाराणा जी को

महाराणा के गौरव को नमन

ये तो पढ पढ कर ही रोमांच होने लगता है.

रामराम.

बढ़िया एपीसोड चल रहा है जी!
बधाई!

ये है सच्चे राजपूत योध्धा के गुण

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