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Jan 29, 2010

सुख और स्वातंत्र्य -2

भाग -१ का शेष ........
चित्रगुप्त बिना सिर उठाये कहे जा रहा था -
' काणुजा में जाकर कर्मयोगी की भांति इसने सैन्य संग्रह किया | देश द्रोही और मुग़ल भक्त रतन सिंह इसके आगे नहीं झुका तो इसने उसके गांव आसरलाई की ईंट ईंट बिखेर दी | एक देशद्रोही की संघर्ष हीनता का पाप इसी चंद्रसेन के घोड़ों की टापों से कुचला जाकर हमेशा के लिए समाप्त हो गया | आसरलाई के अवशेष उसकी एक मात्र आत्मा है जो आज भी इस चंद्रसेन जैसे देश भक्तों की खोज में भटक रही है | '
यमराज ने एक 'वाह ' भरी और चित्रगुप्त ने उसकी और उडती निगाहों से देखकर पुन: कहना शुरू किया -
' ऐसे कठिन समय में जब इसके समक्ष भिनाय की जनता ने आकर पुकार कि वे उसके शासक मादलिया के अत्याचारों से त्राहि त्राहि कर रहे है तब ' क्षतात त्रायते ' के मन्त्र को चरितार्थ करता हुआ यह शक्ति व्यय की बिना चिंता किये भिनाय में आ धमका | मादलिया के यहाँ महफ़िल चल रही थी , शराब के दौर में मानवता निगली जा रही थी और अचानक इस चन्द्रसेन की तलवार चमक उठी | प्याले टूट गए , पैमाने लुढ़क गए , सूरा के साथ मादलिया के जुल्मों की कहानी भी सदा के लिए भूमि पर छितरा गयी |'
चित्रगुप्त बिना विश्राम लिए कहे जा रहा था -
किन्तु अकबर की निगाहों में स्वतंत्रता का हर प्रेमी खटकता रहता था | मातृभूमि से प्रेम करना करना उसकी नज़रों में हिन्दुस्तान की बगावत थी और ऐसे ही इस बागी चंद्रसेन को झुकाने के लिए उसने शाहकुली खां को प्रबल सेना के साथ सोजत की और भेजा | इसके भतीजे कल्ला ने बीच में ही फ़ौज को रोक लिया और चंद्रसेन भी आ धमका , कल्ला रायमलोत को शाबासी देने | दोनों सिरियारी के किले की और मुड़े | '
चित्रगुप्त ने गला साफ़ किया -
' बनजारे कोरणे के किले उतरे और वहां भी घमासान मचा | तलवारों से तलवारें इस प्रकार टकरा रही थी जैसे प्रलय की बिजलियाँ परस्पर टकराकर संहार के लिए उतावली हो रही हो | चंद्रसेन और कल्ला लड़ते रहे -लड़ते रहे परन्तु भाग्य सदैव वीरता से डाह किया करता है | विजय युग -निर्माताओं से सदा आँख मिचौनी खेला करती है उस आँख मिचौनी में चंद्रसेन के भतीजे केशवदास पृथ्वीराज और महेशदास शत्रु के हाथ लगे परन्तु वीरता भी ममता के कदमो पर कब सिर झुकाया करती है | '
यमराज मनोयोग से सुन रहा था -
' उसी सिर को झुकाने के लिए शाही फ़ौज सिवाणे की और गई क्योंकि चंद्रसेन अब सिवाणे आ गया था | एक वर्ष तक घेरा रहा | कभी कभी रसद के लिए दो दो हाथ हो जाये करते थे पर अनमी का सिर नहीं झुका |'
चित्रगुप्त कहे जा रहा था -
क्रमश:........




नदी में उगा एक शहर- वेनिस!! : उडनतश्तरी

5 comments:

कहानी बढिया चल रही है-इतिहास की जानकारी दे रहे हैं-आभार

सुंदर और ऐतिहासिक जानकारी का भंडार खोल दिया है आपने. आभार,

रामराम.

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