भाग एक का शेष ............
जीती हुई बाजी हारते देख असंख्य शत्रु किले में घुस आये और अंधाधुंध वार चलाने लगे | और खच्च !
कल्ला का सिर धड से अलग हो गया |
सिर चला गया हवा में चक्कर कटता हुआ हाड़ी के पास जो पहले से ही हाथ में नारियल लिए इसी की प्रतीक्षा कर रही था |
चिता जल उठी और नारद जी ने मन मन ही मंत्रार्ध गुन गुनगुनाया -
अजो नित्य : शाश्वतोय्म पुराणों,
न हन्यते हन्यमाने शरीरे |
सिर चला गया और धड दोनों हाथों से तलवारें चला रहा है | एक और कल्ला की तलवारें शत्रुओं के शोणित से अपनी प्यास बुझा रही है और दूसरी और चिता में जलकर राजपूती अपनी प्यास आग में बुझा रही है | एक और व्योम मार्ग पर दो पथिक अनंत पथ की यात्रा पर बढ़ते आ रहे है हाथ में हाथ लिए , मुस्कराते हुए कभी कभी मुड़कर देखते है अपने ही बहे हुए रक्त को और अपनी ही जलती हुई चिता को | दूसरी और मृत्यु लोक में एक अमर कहानी ख़त्म हो रही है -सदा के लिए ,सदा सर्वदा के लिए |
स्वर्ग में गन्धर्वो के तानपुरे सहसा झनझना उठे | अप्सराओं के घुंघरू तबलों की थप्पी के साथ एक साथ छनछना उठे | सोमरस के प्याले में प्रेम भरी मनुहारें चलने लगी | शंख और दिव्य शहनाईयों में परस्पर वार्तालाप होने लगे | देवताओं की स्वागत भरी निगाहें परस्पर ले दे रही थी | नारद जी ने मुंह मोड़कर देखा तो कल्ला खड़ा है , मरा नहीं और हाड़ी भी जली नहीं , सामने खड़ी है |
नारद जी ने अपनी शंका का स्वयं ही समाधान किया - ' ऐसी जिन्दगी भी क्या कभी जल मर सकती है ? मरती तो केवल छाया है -छाया |' आँखों को अर्ध्मुन्दी कर मग्न होकर नारद ने वीणा बजाना शुरू किया | अप्सराओं को ऐसे ओजपूर्ण ,शूरवीर और तेजस्वी वर के गले में वरमाला डालने का साहस नहीं हो रहा था | फिर भी स्वर्ग सनाथ हो गया और धरती अनाथ क्योंकि धरा का पति कल्ला आज धरा को छोड़ कर स्वर्ग में चला आया था |
अकबर के दरबार तो बाद में भी लगे है , कई शहंशाहों के ठाठ बने और उजाड़ गए पर भरे दरबारों में मूंछ पर हाथ देने का साहस किसी को नहीं हुआ क्योंकि एसा तो केवल कल्ला ही था जो कभी लौटकर नहीं आया |
मूंछो वाले तो आज भी बहुत है , लेकिन वह पानी कहाँ मुछ का , वह अलबेला बांकापन कहाँ जो सल्तनतों तक को चुनौती दे सके | मूंछों की तो मरोड़ ही कल्ला रायमलोत के साथ चली गई |
रूप की प्यास बुझाने के लिए अल्लाउद्दीन चितौड़ पर और औरंगजेब रूपनगर पर चढ़ आया था पर मौत की मजाक उड़ाकर अकबर की प्यास को अंगूठा दिखाने वाला कल्ला रायमलोत ही था | मौत की अब कौन मसखरी करे , कल्ला जो चला गया |
पृथ्वीराज ने तो बाद में भी कविताएँ की है , कई रसिक महाकवि भी बन गए , नै भाषाओँ ने जन्म लिए और नई कल्पनाओं ने उड़ाने भरी है पर वह शमा ही कहाँ ,वह प्रवाह ही कहाँ , और वह सौष्ठव भी कहाँ ? उन्हें तो पात्र ही नहीं मिलता क्योंकि कविताएँ धरती पर रह गई और उनका पात्र कल्ला स्वर्ग जो चला गया |
युद्ध भी होंगे , वीर भी जन्मेंगे , धरती कभी निर्बीज नहीं हुई है | सिर भी कटेंगे और कटने के बाद भी लड़े है , बोटी बोटी कटने पर झुझते हुए दिखाई देंगे परन्तु हाथियों के चक्कर करने वाला और घोड़ों की टाँगे पकड़कर फेंकने का दृश्य कभी नहीं देखा , कल्ला रायमलोत जो चला गया |
मरुधरा की सूखी और भूखी धरा वर्षों से प्रतीक्षा कर रही है , सिवाणे का उपेक्षित और उजड़ा हुआ किला अब भी दहाड़ मार रहा है , कोई हमारी भी प्यास बुझाओ , कोई हमें भी सनाथ करो , तब वर्षा की कंजूस फुहारें उदारता का स्वांग रचकर फुसलाने की चेष्ठा करती है लेकिन इन पत्थरों पर लिखी हुई अमिट कविताओं की आग न कभी शांत हुई है और न कभी शांत होगी | कल्ला रायमलोत लौट के आने का नहीं और धरा और धर्म की मांग पूरी होने की नहीं |
कल्ला रायमलोत के वियोग में यहाँ की वनस्पति सुख गई है , फिर भी उसकी आँखों में कातरता के जलप्रपात ढुलक रहे है | जिसकी तलवार से आसमान के सितारे टूट गए थे ,मरने के बाद भी जिसकी भुजाएँ अपना कर्तव्य निभा रही थी , जिसकी यादगार आज भी कर्तव्य की याद दिला रही है ,याद दिला रही है कि वह भी एक क्षत्रिय था |
चित्रपट चल रहा था और दृश्य बदलते जा रहे थे |
स्व. श्री तनसिंह ,बाड़मेर की कलम से 
भूत प्रेत और अलोकिक शक्तियां
ताऊ डॉट इन: ताऊ पहेली - 58 : विजेता श्री प्रकाश गोविंद
एलोवेरा के संग, लायें जीवन में नया उमंग
पालतू कुत्ते या फिर पालतू आतंकी ?
54 minutes ago





6 comments:
यहाँ स्वागत तो वहाँ भी स्वागत!
बहुत सुंदर.
रामराम.
बहुत बढ़िया!
पिछली पोस्ट भी आज पढी । सुन्दर प्रस्तुति आभार
लजवाब बहुत सुंदर
स्व. श्री तनसिंह जी की कलम का तो कायल हो गया मैं। ओजस्विता कलम में पिरो लेना हर किसी के बस की बात नहीं।
धन्यवाद।
Post a Comment