भाग १ से आगे ....
' महाराणा ! मेवाड़ के सरदार आए है , आपके चरणों का कुशल पूछने |'
'उन्हें कह दो लौट कर चितौड़ चले जाएँ और कुशल पूछें अपनी आयु और परिवार का | मुझपर सारंगदेव का अहसान था | पृथ्वीराज और जयमाल ने मुझ पर आक्रमण किया था तब उस स्वामिभक्त साथी ने उसके वार को अपने ही सिर पर ले लिया | अपने पुत्र लिम्बा को उसने मेरे लिए खोया | शरीर पर ३५ घाव लगे और अंत में बाठरडे देवी मंदिर में कपट से पृथ्वीराज के हाथों मारा गया | मेरी स्वामिभक्ति उसे कितनी महंगी पड़ी , पर मै अभागा तो अपने हित चिंतकों के अहसान भी नहीं उतार सका | इन कायर सदारों ने मेरी आयु पर डाका डाल दिया | काश ! मै स्वामिभक्त सारंगदेव की समाधी पर दो आंसू ही बहा सकता ! जाओ सरदारों ! मेवाड़ के मगरों पर खरगोशों की शिकार खेलो ! देखो , बचो , बचो ! किसी घोड़े की फेंट में आ गए तो यही रह जावोगे | यहाँ घोड़े दौड़ रहे है -घोड़े ! खानवा के युद्ध क्षेत्र में दौड़ते जा रहे है '-
बङगङां बङगङां बङगङां |
'मेवाड़ जैसी पवित्र भूमि पर तुम्हारे जैसे कायर सरदारों के पाप को मैंने अपने शरीर पर लगे अस्सी घावों के रक्त से धोने की चेष्टा की है | परिस्थितियां चाहे किसी प्रकार की हों मुझे निराश नहीं कर सकती | मेरी एक आँख गई , एक हाथ कटा , एक पैर कटा , एक पैर टूटा परन्तु मेरा दिल नहीं टूटा | मैंने असम्भव को संभव कर दिया , सिंहों को साथ कर दिया ,बिछुड़े हुओं को मिलाकर अनेकों को एक कर दिया | परन्तु अफ़सोस .............!
इतना कहकर महाराणा सहसा कराहने लगे | बड़ा मार्मिक था उनका कराहना | आँखों में एक आंसू छलक कर बहने की तैयारी करने लगा |
' क्यों अन्नदाता ! किसी घाव में पीड़ा हो रही है क्या ? आपकी आँख का यह आंसू कहीं आपकी महानता ..............|'
मेरे शरीर पर तो ऐसी कोई जगह नहीं बची है जहाँ घाव नहीं हो | पर आज एक नया घाव उभर आया है | उस घाव में खून नहीं नहीं निकल रहा है . पानी निकल रहा है पानी ,और उस पानी से मेरे अरमानों की तस्वीर गल गल कर आँखों में आ रही है | वह देखो , विभीषण जा रहा है | तीस हजार घुड सवारों के साथ बड़ी बेशर्मी से बाबर की और जा रहा है और खानवा के युद्ध क्षेत्र में उसके देशद्रोही घोड़े दौड़ रहे है '-
बङगङां बङगङां बङगङां |
महाराणा की आँख का उमड़ा हुआ आंसू हिम्मत कर आखिर ढुलक ही पड़ा |
'अन्नदाता ! हिम्मत मत हारिये |
महाराणा ने झट से विवशता को पोंछ डाला | बोले - ' हाँ ,ठीक कह रहे हो ! मै हिम्मत कैसे हारूँ | यह कठिन समय मेरी हिम्मत की परीक्षा का समय है | अब मुझे खुद को लड़ना है | लाओ मेरा घोडा | इस पर तो जीन भी नहीं है | परवाह नहीं | यह लो सवार हो गया | अब खानवा के युद्ध क्षेत्र में महाराणा संग्राम सिंह का घोडा दौड़ेगा | '
राणा सांगा शय्या त्याग कर एक घुड़सवार से झूमते दौड़ने लगे | लोगों ने दौड़कर बड़ी कठिनाई से उन्हें पकड़ लिया
क्रमश:..........
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6 comments:
लाजवाब प्रस्तुति।
राणा प्रताप की बहादुरी और समर्पण को नमन
धीरू सिंह जी
ये आलेख राणा सांगा पर है |
बहादुरी का दुसरा नाम है राणा प्रताप यह बात आप ने सिद्ध कर दी.
धन्यवाद
क्रमश:......ka intjaar.
तन सिंह जी की कलम की लाजवाब प्रस्तुति |
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