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Jan 14, 2010

दुर्भाग्य का सहोदर -2

दुर्भाग्य का सहोदर भाग १ का शेष
एक ओर सात और दूसरी ओर ग्यारह अक्षौहिणी सेना के बीच जीने और मरने की बाजी लग रही है | महाभारत का युद्ध चल रहा है | शस्त्र झनझना रहे है और शंख व रणभेरियाँ बज रही है |
यह कर्ण महारथी भी है |
' जब वह रणभूमि में उतरता है तो ऐसा लगता है जैसे कोई कुशल कथावाचक वीर रस के किसी किसी सरस छंद का मनोयोग से पाठ कर रहा हो ; जैसे कोई उलझी हुई समस्या वर्षों से प्रयास के बाद अपना ही हल निकलने जा रही हो ; जैसे ईश्वर का अचूक अभिशाप अपने दुर्दिनों के दुर्भाग्य को पीस डालने के लिए बाहें चढ़ा रहा हो | जब उसके तरकश के बाण निकलते थे तो एसा प्रतीत होता था जैसे मोहमाया से हरे भरे संसार पर क्रुद्ध होने के कारण प्रलय की आँखों में चिंगारियां निकल रही है , जैसे संकट के समय जल्दी में आये भगवान् विष्णु के बुलाने पर गरुड़ परिवार पंख लगे हुए पर्वत की तरह उड़ रहा हो |
' कलिंगराज चित्रांगद की राजकन्या के स्वयंबर में राजकन्या के अपहरण पर दुर्योधन की इसी अकेले वीर ने सैकड़ों राजाओं से रक्षा की , जिसके आगे त्रिलोकीनाथ ने भाग कर अपना नाम रणछोड़ दास करवाया था , उसी मगधराज जरासंघ को इसी कर्ण ने बाहुकंटक युद्ध से व्याकुल कर वश में कर लिया था |
' उसकी बाण वर्षा में इतना बल होता था कि तीनो लोकों का भार लिए सारथी रूप कृष्ण और गरुड़ध्वज सव्यसाची अपने रथ सहित कई कदम पीछे हट जाते थे |
' परन्तु दुर्भाग्य उसका सहोदर था | ऐसे कठिन और महत्त्वपूर्ण अवसर पर उसके रथ के पहियों को धरती ने निगल डाला और इसी प्रयास में उसे पराजय का मुंह देखना पड़ा | '
एक ओर सात और दूसरी ओर ग्यारह अक्षौहिणी सेना के बीच जीने और मरने की बाजी लग रही है | महाभारत का युद्ध चल रहा है | शस्त्र झनझना रहे है और शंख व रणभेरियाँ बज रही है |

यह कर्ण दानवीर भी है |
' प्रात:काल इसी का नाम आज तक लिया जाता है |
इसके द्वार से न कोई निराश एयर न कोई खाली हाथ लौटा | नित्यप्रति अपने समस्त स्वर्ण का दान तो इसका नित्त्यकर्म था किन्तु आई हुई विजय ,कमाई हुई शक्ति और अमर जिन्दगी तक का भी बिना शिकन दान कर दिया |
' देवराज इंद्र जब स्वार्थी होकर अपने पुत्र अर्जुन की रक्षा के लिए दिव्य कुंडल और कवच प्राप्त करने आये तो अपने पिता सूर्य भगवान की चेतावनी के बावजूद भी वह ना नहीं कहा सका |
अपने ही प्रबल शत्रु के लिए उसकी उपेक्षा करने वाली माँ अभयदान लेने आई तब वह ना नहीं कर सका , और .................|
जीवन की संध्या के समय परीक्षा के लिए कृष्ण और अर्जुन ब्राह्मण वेष धारण कर युद्ध की घायलावस्था में स्वर्ण मांगने आये तब उसने अपने दांत तोड़ कर उसमे लगी स्वर्ण मेखों का दान किया |
' परन्तु दुर्भाग्य उसका सहोदर था | ऐसा श्रेष्ठ पुरुष होकर भी दुर्योधन के पक्ष की ओर चला गया इसलिए वेद व्यास ही नहीं , आज भी उसकी सभी उपेक्षा करते है | '
' परन्तु कौन नहीं जनता कि कर्ण भी एक क्षत्रिय था | '
एक ओर सात और दूसरी ओर ग्यारह अक्षौहिणी सेना के बीच जीने और मरने की बाजी लग रही है | महाभारत का युद्ध चल रहा है | शस्त्र झनझना रहे है और शंख व रणभेरियाँ बज रही है |
चित्रपट चल रहा है और दृश्य बदलते जा रहे थे |
पूज्य स्व. श्री तन सिंह जी द्वारा लिखित





ताऊ....वो जो हम मे तुम मे करार था.....?
दूर हुए मुझसे वो मेरे अपने थे..
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9 comments:

बहुत सुंदर श्रंखला है, आपका बहुत बहुत आभार.

रामराम.

बहुत सुंदर कथा, धन्यवाद

रतन सिंग जी-बहुत बढिया प्रेरणा दायक प्रसंग चला रखा है

संकरात की राम-राम

बहुत ही उपयोगी हैं यह पुरातन प्रसंग!

अति सुन्दर लेख है |

अच्छा रहा यह भी,आभार.

आनन्द आ गया. जारी रखें!

"दुर्भाग्य का सहोदर" तनसिगजी की यादगार रचनाओं में से एक है। सूर्यपुत्र कर्ण के जीवन के मार्मिक पहलुओं को विचारोत्तेजक शैली में उजागर किया है।
आदरणीय रतनसिह्जी शेखावत को इतनी सुन्दर वेबसाइट के लिये लख-लख धन्यवाद,आभार!

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