यमराज बड़े ध्यान से सुन रहा था और चित्रगुप्त बही खाते उलटता हुआ विवरण दे रहा था -
महाराज !
' मारवाड़ के सुप्रसिद्ध योद्धा राव मालदेव का यह छटा पुत्र था | इक्कीस वर्ष की अवस्था में ११ नवम्बर १६६२ को यह जोधपुर की राजगद्दी पर बैठा | आपने इसे केवल उन्नीस वर्ष दिए थे और उन उन्नीस वर्षों में इसने उन्नीस लड़ाइयाँ लड़ी | '
यमराज ने कहा - ' कहे जाओ , मै ध्यान से सुन रहा हूँ |'
'धर्मराज !'
सोजत में इसका भाई राम शासन कर रहा था किन्तु उसकी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा जोधपुर पर राज्य करने की थी | स्वतंत्रता को गिरवी रखकर आत्मसम्मान को कुचलता हुआ आने वाली पीढ़ियों के नाम कालिख लगाकर वह अपने अरमानो के चिराग जलाना चाहता था | अपनी मातृभूमि के सम्मान के साथ बलात्कार करने के लिए उसने अकबर के सैन्य बल से नापाक सांठ-गाँठ की परन्तु चंद्रसेन की तलवारों ने उस गठबंधन को तोड़कर सोजत के पतन की कहानी नाडोल तक रंग दी | सोजत दुर्ग का सिर इस महापुरुष के चरणों में भक्तिभाव से झुक गया |'
यमराज ने एक हुनकर भरा और चित्रगुप्त बही खातों पर झुका हुआ सुनाए जा रहा था -
' घायल राम ने फुफकारना शुरू किया | नागौर के शाही हाकिम हुसैन्कुली बेग से मिलकर उसने जोधपुर के किले को घेर लिया | उस दिन संसार भर की निर्लज्जता राम के कंधो पर चढ़कर अट्टहास करने लगी | सोजत का परगना लेकर निर्लज्जता चुप हुई परन्तु राजा राम फिर भी चुप नहीं हुआ |
चित्रगुप्त कहे जा रहा था |
' राम अकबर के दरबार में गया | पीढ़ियों की पाग उसने मुग़ल सल्नत के आगे झुका कर बदले में अपनी ही मातृभूमि को विधवा बनाने की मांग की | शाही फौजों ने फिर जोधपुर को घेर लिया | महाराज ! यह व्यक्ति जो आपके सामने खड़ा है न तो मौत के लिए मरना जानता था और न जिन्दगी के लिए जीना | यह तो चाहता था मौत के लिए जीना और जिन्दगी के लिए मरना | जोधपुर मुगलों का हो गया और चंद्रसेन के घोड़े भाद्राजून की ओर मुड़े |
चित्रगुप्त ने अपने बहीखातों का एक और पृष्ठ पलटा और कहना शुरू किया -
'नागौर में अकबर ने इसे संधि के लिए बुलाया लेकिन घोड़ों को दगवाने की संधि चाहे नाम मात्र की हो किन्तु थी तो अपमान जनक ही | इसने सम्मान पूर्वक जीवन के लिए जोधपुर के राजमहलों की मादक यादगारों , राजकीय ठाठ -बाट के सुनहले स्वप्नों , उमड़ते हुए यौवन के लिए भोग की आग्रह भरी मनुहारों को उसी क्षण लात मार अपनी संतान का सिर ऊँचा किया | अकबर की सेना ने भाद्राजून के किले को घेर लिया किन्तु त्यागी चंद्रसेन ने चमकती तलवारों के बीच पुरुषार्थी की भांति मार्ग बनाकर सिवाणे में अपनी पताका गाड़ दी | '
चित्रगुप्त बिना सिर उठाये कहे जा रहा था -..............
क्रमश :..........
नदी में उगा एक शहर- वेनिस!! : उडनतश्तरी
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पालतू कुत्ते या फिर पालतू आतंकी ?
54 minutes ago





7 comments:
रोचक...जारी रहिये!!
रतन सिंग जी-बहुत बढिया। राम-राम
बहुत सुंदर... अगली कडी का इंतजार रहेगा
ओह, धर्मराज ने फिर क्या किया?
rochak kahani....
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रोचक है!
अगली कड़ी का इन्तजार!
बढ़िया,इन्तजार!
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