न्यायालय में न्याय अपनी कुर्सी पर बैठकर निर्णय करने जा रहा था | दर्शकों से अदालत खचाखच भरी हुई थी | आज एक अनूठे मुकदमे की सुनवाई होने वाली थी |
वादी के कटघरे में विश्वासपूर्ण मुद्रा लिए सत्य प्रविष्ट होकर बोला -- " न्यायमूर्ते ! मैंने प्रतिवादी को अपना समस्त राज्य दान में दे दिया है , परन्तु वह स्वीकार नहीं करना चाहता | मेरे राज्य का उपयोग करने के लिए उसे बाध्य किया जाय | "
लोगो की निगाहे प्रतिवादी के कटघरे की और घूम गई | भगवे वस्त्रों में ब्रहस्पति की भांति सुशोभित होते हुए त्याग ने प्रतिवाद किया -- " परन्तु महाराज ! वादी ने वह दान अपनी स्वप्नावस्था में किया है , जिसे कैसे स्वीकार किया जा सकता है ?"
सत्य- - "भगवन ! मै सदैव देता आया हूँ, लेता कुछ नहीं | यह मेरी सांस्कृतिक परम्परा है | प्रतिवादी स्वप्न के बहाने दान करना चाहता है | ऐसी फिसलनो और बहनों में मै बह सकता हूँ ऐसी मान्यता प्रतिवादी के मन में है | यह मेरा मूल्यांकन किया जा रहा है | इसे मै अपना अपमान मानता हूँ | मैंने वचन दे दिया है,फिर वह चाहे स्वप्न में ही क्यों न हो | मेरी परम्परा ने अपने ही नहीं , सृष्टि और ईश्वर के स्वप्न सच्चे किये है | मेरी निगाहों में स्वप्न सत्य है किन्तु सत्य स्वप्न नहीं | त्याग ने मेरे यहाँ बड़े सोभाग्य से अतिथि बनना स्वीकार किया है फिर चाहे उसने बेहोशी में ही मेरा द्वार क्यों न खटखटाया हो | मेरे द्वार पर त्याग अभ्यागत बनकर आया है , उसे निराश लौटने पर इतिहास मुझ पर लज्जित होगा | त्याग के आतिथ्य-सत्कार का सर्वप्रथम मेरा और एक मात्र मेरा अधिकार है |
बीच में ही सरकारी वकील बोल उठा - " यह अहंकार है , वादी से उसकी कीमत मांगी जाय |
प्रतिवादी ने हाँ में हाँ मिलाते कहा -- " हाँ महाराज ! यदि वादी को इतना अहंकार है तो अपने दान की मै दक्षिणा चाहता हूँ |"
विजयभरी मुस्कान में सत्य ने नम्रतापूर्वक कहा- " स्वीकार है | दक्षिणा में आपको दस लक्ष स्वर्ण मुद्राए ....|"
प्रतिवादी -- " परन्तु मुद्राएँ तो राज्य की जिसे वादी ने पहले ही मुझे दे दिया है |"
वादी -- " तो यह लो ! मै डोम के घर बिकता हूँ ,मेरी महारानी ब्रह्मण के यहाँ सेवावृति करेगी , मेरा राजकुमार पंचतत्व को प्राप्त हो गया है | यह देखो , मै कफ़न का आधा हिस्सा और श्मशान शुल्क का एक टका मांग रहा हूँ | मै अपना हिस्सा लेकर ही रहूँगा अन्यथा रोहताश का दाह संस्कार नहीं होने दूंगा ! हाँ! हाँ ! हाँ ! मै उसकी साडी का भी आधा हिस्सा ले रहा हूँ क्योकि यही तो उसका कफ़न है | कर्तव्य के समक्ष स्त्री का स्नेह और पुत्र की ममता मुझे नहीं डिगा सकती | अभी तो क्या हुआ, श्मशान का टका बाकी है - क्या अब भी तुम्हारी दक्षिणा नहीं चुकी |"
प्रतिवादी चुप हो गया | उसने आँखे नीचे की और झुका ली | सरकारी वकील बगलें झाँकने लगा और न्याय ने उठते हुए फैसला दिया - " सत्यवादी राजा हरीशचंद्र की जय हो |"
अदालत उठ गयी | दर्शक कानाफूसी करते हुए जा रहे कि वह एक क्षत्रिय था |
चित्रपट चल रहा था और द्रश्य बदलते जा रहे थे |
बाड़मेर के पूर्व सांसद स्व.श्री तन सिंह जी द्वारा लिखित !
पालतू कुत्ते या फिर पालतू आतंकी ?
57 minutes ago
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7 comments:
बहुत बहुत आभार आपका स्व.तनसिंह जी की यह रचना पढवाने के लिये. उनकी रचनाएं हमेशा ही बहुत ज्ञानवर्धक और उच्च आदर्शों वाली होती हैं.
रामराम.
बहुत सशक्त और प्रभावपूर्ण प्रस्तुति ! शुक्रिया ! सच है स्वप्न सत्य है सत्य स्वप्न नहीं !
शुक्रिया .....इतनी सुंदर रचना पढवाने के लिये.
शुक्रिया तनसिंह जी की इतनी अच्छी रचना पढ़वाने के लिए..
सत्य वादी राजा हरीश चंद्र कि यह कथा क्षत्रिय धर्म को गोरवान्वित करने वाली है । आपका बहुत बहुत आभार इस रचना के लिये ।
इस कथा ने अनेक को प्रेरित किया है।
क्या आदर्श प्रस्तुत किया है. इस रचना के लिए आभार.
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